Monday, December 17, 2012

मोदी और ओबामा

बराक ओबामा अभी हाल ही में प्रेसीडेंट चुने गए हैं और मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। गुजरात में मिलने वाली बड़ी जीत उनकी ताजपोशी का रास्ता प्रशस्त करेगी।
                                                                                                          दुनिया के दो महान लोकतंत्रों में हर मायने में तुलना दिलचस्प है और लीडरशिप की तुलना भी होनी चाहिए। हमारे अखबार मोदी के नेतृत्व के कशीदे गढ़ रहे हैं। अमेरिकी अखबार भी उनके नेतृत्व के कायल हैं इस बार वे जरूर चाहेंगे कि लीडरशिप अंडरएचीवर नहीं हो। ओबामा भले ही कठिन समय में अमेरिका का नेतृत्व दोबारा प्राप्त करने में सफल हो गए हों लेकिन अर्थव्यवस्था और विदेश नीति के फ्रंट पर उन्हें बड़ी सफलताएं नहीं मिलीं। मोदी ने जिस तरह गुजरात को दिशा दी है उससे लगता है कि अर्थव्यवस्था के रिवाइवल में वे सफल होंगे।
                                                                                                                                  फिर भी बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या विकास की दो अंकीय दर मात्र  से हमारा जीवन खुशहाल हो जाएगा। क्या मात्र कठोर लीडरशिप से हमारी सारी समस्याएं छूमंतर हो जाएंगी।
                                                                                        जिस दिन अखबार मोदी के कशीदे गढ़ने वाले लेख लिख रहे थे, एक छोटा समाचार भी साथ ही दिख रहा था। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कनेक्टिकट स्कूल के बच्चों के परिवारजनों एवं राष्ट को एक भावुक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि जो बच्चे इस दुखद घटना का शिकार हो गए, उन्हें अभी पूरी दुनिया देखनी थी, जन्मदिन मनाना था, ग्रेज्युएशन करनी थी, शादी करनी थी और उनके अपने बच्चे भी इस सुंदर धरती को देखते।
                                                                            ओबामा की भावुकता घड़ियाली नहीं थी, ये लीडरशिप होती है अपने लोगों के साथ जुड़ने का भाव। इसके ठीक बाद मैंने गुजरात दंगों के बाद अटल जी की प्रसिद्ध राजधर्म वाली प्रेस कांफ्रेंस देखी। कांफ्रेंस में मोदी भी बैठे थे। गुजरात दंगों का सच जानने के लिए किसी आयोग के गठन की जरूरत नहीं। उस दिन मोदी के चेहरे पर गुजरात दंगों का सच नजर आ रहा था।
                                                                                                                                      प्रगति का एक रास्ता भावशून्यता का रास्ता भी होता है जिसे कभी हिटलर और माओ ने अपनाया और सफल भी हुए। अगर भारत को इसी तरह की तरक्की चाहिए तो उसे आँखें बंद कर सीधे गुजरात का रास्ता पकड़ना होगा, नहीं तो उसे इंतजार करना होगा कि एक ओबामा आए.......... एक दशक पहले अटल जी ने यह भूमिका निभाई थी,  देश के करोड़ों नागरिकों को अब फिर ऐसे नायक का इंतजार है जो कह सके कि राजा को राजधर्म का पालन करना चाहिए जो ओबामा की तरह कह सके कि मैं एक प्रेसिडेंट की हैसियत से नहीं, यह बात एक पालक के नजरिये से कह रहा हूँ।

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर सौरभ जी ...बहुत अच्छा लगा .....आपका विषय और दृष्टिकोण..दोनों ...:)

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  2. अभी तो दूर-दूर तक कोई अटल जी का वारिस नजर नही आता .....
    फिर आज के माहौल में ..जहाँ कानून नाम की किसी चीज़ का कोई डर नही ..
    किसी की आबरू ,,किसी की जान की कोई हिफाज़त नही ..तो फिर एक नजर तो मोदी पर जाएगी ही ...??? जरा आज दिल्ली की ख़ास खबर भी पढ़े ...:-((

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  3. prabhavit karta lekhan avum vichar.
    Aabhar

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    1. @@ काश कभी इन नीच कांग्रेसियो की बेटियो और बहनों के साथ इस तरह का गैंगरेप होता तो हम देखते की ये कांग्रेसी किस तरह हसते है ????

      ..... are you not ashamed to say that "kaash kisee stree ke saath gangrape hua hota" ??? just because she is a family member of a person from a political party you dislike she should be gangraped ???? how is this thinking different from duryodhana who insulted draupadi to hit out at pandavas, or ravana who kidnapped seeta to revenge on rama ? chhih :(

      exactly what i was talking about - you people think that women are possessions of men - to be hurt to hit out at them - woman's own identity does not exist, their own pain is immaterial .... read this post http://girijeshrao.blogspot.in/2012/12/delhi-rape.html

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    2. since the original comment is removed, mine is out of context here. if you wish, you can please remove both completely...

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    3. your sentiment is reflected in ur opinion so i never delete it, i feel proud when u comment and strongly oppose the language he used. thanks

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आपने इतने धैर्यपूर्वक इसे पढ़ा, इसके लिए आपका हृदय से आभार। जो कुछ लिखा, उसमें आपका मार्गदर्शन सदैव से अपेक्षित रहेगा और अपने लेखन के प्रति मेरे संशय को कुछ कम कर पाएगा। हृदय से धन्यवाद