Saturday, December 22, 2012

भगवान तुमने देर क्यों कर दी?..........




क्रिकेट के भगवान ने खेल को अलविदा कर दिया। सोचा था कि जब भगवान विदा होंगे तो वो घड़ी विलक्षण होगी। लोगों के लिए उनकी तारीफ में पुल बाँधने के लिए शब्द कम होंगे लेकिन अफसोस भगवान ने बहुत देर कर दी।
                                           जैसे परिवार में होता है एक उम्र आती है जब परिवार के सदस्य सबसे उम्रदराज सदस्य की मौत की प्रतीक्षा करने लगते हैं वो मर क्यों नहीं जाता। उसे शर्म क्यों नहीं आती, आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण हुए बगैर भी वो जिये क्यों जा रहा है। भगवान के बल्ले से जब तक रन निकलते रहे, आलोचक चुप रहे।
        जब बल्ला बंद हो गया तो मुँह खुल गए। दुख इस बात का नहीं कि उन्हें संन्यास के लिए कहा गया। दुख इस बात का रहा कि आलोचकों ने अपशब्दों का प्रयोग किया। कीर्ति आजाद ने कहा कि सचिन ने देश पर उपकार किया।
                                                 फिर भी मैं कीर्ति को दोष नहीं दूँगा, दोष तो सचिन का है। वे रनों के पहाड़ पर खड़े थे लेकिन उन्हें यह भी कम लग रहा था। वे कीर्तिमानों का शतक लगा चुके थे लेकिन फिर भी उन्हें प्रसिद्धी की भूख बच गई थी। वे ऐसे समय में भी क्रिकेट खेलना चाहते थे जब उनकी तकनीक चूक गई थी।
     उन्होंने थोड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए जीवन भर की उपलब्धियों पर पानी फेर दिया। शायद वे हमेशा की तरह इस इंतजार में रहे कि एक बार फिर बल्ले का जादू उनके विरोधियों को चुप कर दे लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।
                                                     मुझे सार्वजनिक जीवन में सचिन का कोई योगदान नजर नहीं आता। भगवान का सरोकार केवल क्रिकेट में नहीं दिखता, वो हर जगह दिखता है। जब देश लोकपाल की आग में जल रहा था, सचिन ने अपनी राय नहीं रखी। सचिन अंबानी की तरह अट्टालिका बनवाते रहे। उन्होंने करोड़ों रुपए कमाए लेकिन शायद ही फूटी कौड़ी देश के लिए लगाई।
                                                   फिर भी तुममें लाख बुराइयाँ सहीं, लाख लालच ही सही, जब तुम बल्ला पकड़ते हो तो तुममे भगवान दिखने लगता है और आखिर भगवान को भी तो अपना भेष छोड़ना पड़ता है तो हम कह सकते हैं कि क्रिकेट के भगवान ने विदा लेने के लिए एक लीला रची और लोग समझते रहे कि सचिन का बल्ला अब चूक गया है।                                                   

Friday, December 21, 2012

उर्दू और हिंदी की राहें जुदा क्यों हुईं?

कल शाम मेरे शहर में मजाज (नुक्ते के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ) की शायरी में इंकलाबी रंग पर एक व्याख्यान आकाशवाणी द्वारा आयोजित किया गया। मजाज के बारे में थोड़ा सा परिचय इस्मत चुगताई को पढ़कर हुआ था। उनके बारे में ज्यादा जानने की दिलचस्पी थी, यूँ भी उर्दू बहुत भाती है क्योंकि थोड़ी सी दूरी न जाने क्यों हिंदीभाषियों की उर्दू साहित्य से हो गई है।
                                                                मुझे आश्चर्य होता है कि हमने स्कूल में गालिब को नहीं पढ़ा, मीर को तो उन दिनों हम जानते भी नहीं थे। हमारे स्कूली दिनों में दूरदर्शन में एक प्रोग्राम आता था उसमें दो ग्रुप बने होते थे, एक ओर मीर वाले, दूसरी ओर गालिब वाले। मेरी कमजोर बुद्धि में तो मुझे यही लगता था कि कहाँ गालिब वालों से टक्कर मीर वाले ले पाएंगे। रेख्ते के तुम ही उस्ताद नहीं हो गालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था। बहुत बाद में जब गालिब का यह शेर सुना तब लगा कि मीर सचमुच महान हस्ती रहे होंगे।
                                                                            उर्दू के नाम पर नजीर अकबराबादी को ही पढ़ा था, उनकी कविता रोटी मुझे ही नहीं, उन छात्रों को भी पसंद थी जो हिंदी की पढ़ाई में रुचि नहीं लेते थे। लंच में हम गाया करते, जब आदमी के पेट में जाती हैं रोटियाँ बदन में फूली नहीं समाती हैं रोटियाँ। सचमुच नजीर ऐसे शायर थे जिन्होंने बिना किसी प्रगतिशील आंदोलन से प्रभावित हुए आम जनता के हालात पर नज्म लिखी और इतने लोकप्रिय हुए।
                         व्याख्यान जैसे-जैसे आगे बढ़ा, मुझे दुख हुआ कि क्यों हिंदी साहित्य और उर्दू साहित्य की राहें जुदा हो गईं। वे बताते रहे कि फैज बड़े तरक्की पसंद थे, उनसे कोई विवाद नहीं जुड़ा। जैसे हिंदी में निराला के किस्से भाते हैं वैसे ही उर्दू के दिलचस्प किस्से हैं लेकिन हमें नहीं मालूम। हम फैज को जानना चाहते हैं फिराक को पढ़ना चाहते हैं लेकिन लगता है कि बहुत देर हो चुकी है। जैसे हिंदी में कठिन शब्दों के प्रयोग को इतना हतोत्साहित किया गया कि अब तत्सम हिंदी साहित्य में दुर्लभ है वैसे ही उर्दू के बहुत से कशिश से भरे शब्द अब सुनाई नहीं देते। जैसे प्रसाद हमें समझ नहीं आएंगे, वैसे ही फैज भी नहीं।
                                                                                                                    
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मजाज से जुड़े दो दिलचस्प वाकये
पहला वाकया जांनिसार अख्तर से जुड़ा है। उनकी पत्नी सफिया मजाज की बहन थी। मजाज बहुत ज्यादा शराब पीते थे लेकिन सफिया की बड़ी इज्जत करते थे और उसके सामने कभी शराब नहीं पी की। एक दिन जब मजाज ग्वालियर आए और जांनिसार के पास रूके और खूब शराब पी। पीकर भावुक हुए और जांनिसार को कहा कि सफिया को बुलाओ। सफिया ने कहा कि जब वो होश में आएगा तो उसे दुख होगा कि वो मेरे साथ ऐसी हालत में पेश आया। जांनिसार ने जाकर मजाज को बताया। मजाज खूब रोने लगे, सफिया भी अंदर खूब रोईं।
दूसरा वाकया जावेद अख्तर ने एक बार एक प्रोग्राम में  सुनाया था। साहिर और मजाज एक बार मुंबई पहुँचे फिल्मों में गीत लिखने के वास्ते एक प्रोड्यूसर से मिले। प्रोड्यूसर ने एक थीम बताई। इन्होंने रात भर जागकर गीत तैयार किया। सुबह प्रोड्यूसर को दिखाया। प्रोड्यूसर के चेहरे पर खास खुशी नहीं दिखाई दी। मजाज बड़े दुखी हुए। उन्होंने साहिर से कहा कि मेरे पास एक चीज कलम ही तो है और उस पर ही संदेह हो जाए तो मेरे पास क्या बचेगा? उन्होंने मुंबई को विदा कहा। साहिर की मजबूरी थी, आर्थिक तंगी की वजह से उन्हें अपनी पहचान बनाने तक प्रोड्यूसर्स के नखरे सहने ही थे। जब साहिर मजाज को छोड़ने स्टेशन तक आए तो उन्होंने कहा कि मजाज भाई जब अगली बार आप आएंगे तो अपनी मोटर से आपको पिकअप करूँगा। साहिल का यह सपना पूरा नहीं हुआ, उनकी मोटर तो जल्दी आ गई लेकिन मजाज दुनिया में नहीं रहे।

Monday, December 17, 2012

मोदी और ओबामा

बराक ओबामा अभी हाल ही में प्रेसीडेंट चुने गए हैं और मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं। गुजरात में मिलने वाली बड़ी जीत उनकी ताजपोशी का रास्ता प्रशस्त करेगी।
                                                                                                          दुनिया के दो महान लोकतंत्रों में हर मायने में तुलना दिलचस्प है और लीडरशिप की तुलना भी होनी चाहिए। हमारे अखबार मोदी के नेतृत्व के कशीदे गढ़ रहे हैं। अमेरिकी अखबार भी उनके नेतृत्व के कायल हैं इस बार वे जरूर चाहेंगे कि लीडरशिप अंडरएचीवर नहीं हो। ओबामा भले ही कठिन समय में अमेरिका का नेतृत्व दोबारा प्राप्त करने में सफल हो गए हों लेकिन अर्थव्यवस्था और विदेश नीति के फ्रंट पर उन्हें बड़ी सफलताएं नहीं मिलीं। मोदी ने जिस तरह गुजरात को दिशा दी है उससे लगता है कि अर्थव्यवस्था के रिवाइवल में वे सफल होंगे।
                                                                                                                                  फिर भी बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या विकास की दो अंकीय दर मात्र  से हमारा जीवन खुशहाल हो जाएगा। क्या मात्र कठोर लीडरशिप से हमारी सारी समस्याएं छूमंतर हो जाएंगी।
                                                                                        जिस दिन अखबार मोदी के कशीदे गढ़ने वाले लेख लिख रहे थे, एक छोटा समाचार भी साथ ही दिख रहा था। अमेरिका के राष्ट्रपति ने कनेक्टिकट स्कूल के बच्चों के परिवारजनों एवं राष्ट को एक भावुक संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि जो बच्चे इस दुखद घटना का शिकार हो गए, उन्हें अभी पूरी दुनिया देखनी थी, जन्मदिन मनाना था, ग्रेज्युएशन करनी थी, शादी करनी थी और उनके अपने बच्चे भी इस सुंदर धरती को देखते।
                                                                            ओबामा की भावुकता घड़ियाली नहीं थी, ये लीडरशिप होती है अपने लोगों के साथ जुड़ने का भाव। इसके ठीक बाद मैंने गुजरात दंगों के बाद अटल जी की प्रसिद्ध राजधर्म वाली प्रेस कांफ्रेंस देखी। कांफ्रेंस में मोदी भी बैठे थे। गुजरात दंगों का सच जानने के लिए किसी आयोग के गठन की जरूरत नहीं। उस दिन मोदी के चेहरे पर गुजरात दंगों का सच नजर आ रहा था।
                                                                                                                                      प्रगति का एक रास्ता भावशून्यता का रास्ता भी होता है जिसे कभी हिटलर और माओ ने अपनाया और सफल भी हुए। अगर भारत को इसी तरह की तरक्की चाहिए तो उसे आँखें बंद कर सीधे गुजरात का रास्ता पकड़ना होगा, नहीं तो उसे इंतजार करना होगा कि एक ओबामा आए.......... एक दशक पहले अटल जी ने यह भूमिका निभाई थी,  देश के करोड़ों नागरिकों को अब फिर ऐसे नायक का इंतजार है जो कह सके कि राजा को राजधर्म का पालन करना चाहिए जो ओबामा की तरह कह सके कि मैं एक प्रेसिडेंट की हैसियत से नहीं, यह बात एक पालक के नजरिये से कह रहा हूँ।

Saturday, December 15, 2012

साहिर के दो गीत....

साहिर के लिखे हुए दो गीत इन दिनों मैं यूट्यूब पर सुनता हूँ।   पहला गाना फिल्म दीदी का है इसे मुकेश और सुधा मल्होत्रा ने गाया है। तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको, मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है...... इससे मिलता-जुलता दूसरा गाना तुम मुझे चाहो, न चाहो तो कोई बात नहीं, तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी है। इसे भी मुकेश ने गाया है।
                                                                          तुम मुझे भूल भी जाओ, क्यों अच्छा लगता है? यह गाना हमें ६० के दशक में ले जाता है इसे हिंदी सिनेमा में क्लासिकल प्रेम का दौर कहा जाता है। प्रेमिका की मासूम सोच उसकी जज्बातों में व्यक्त हुई है। ऐसे समय में जब राजनीतिक विचारधाराओं ने प्रेम जैसी नाजुक अभिव्यक्ति को किनारे कर दिया था, एक लड़की जो दुनिया से अपरिचित अपनी छोटी सी दुनिया में खोई है उसके जज्बात को व्यक्त करती हैं। प्रेमी के जज्बात हैं लेकिन वो ये भी देखता है कि उसके चारों और जब गर्दिश छाई हों, लाखों लोग जब दुख भोग रहे हों, वो केवल अपनी मुक्ति कैसे चाह सकता है?



तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको ,
मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है,

मेरे दिल की मेरे जज़बात की क़ीमत क्या है
उलझे-उलझे से ख़्यालात की क़ीमत क्या है
मैंने क्यूं प्यार किया तुमने न क्यूं प्यार किया
इन परेशान सवालात की क़ीमत क्या है
तुम जो ये भी न बताओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है

ज़िन्दगी सिर्फ़ मुहब्बत नहीं कुछ और भी है
ज़ुल्फ़-ओ-रुख़सार की जन्नत नहीं कुछ और भी है
भूख और प्यास की मारी हुई इस दुनिया में
इश्क़ ही एक हक़ीकत नहीं कुछ और भी है
तुम अगर आँख चुराओ तो ये हक़ है तुमको
मैंने तुमसे ही नहीं सबसे मुहब्बत की है

तुमको दुनिया के ग़म-ओ-दर्द से फ़ुरसत ना सही
सबसे उलफ़त सही मुझसे ही मुहब्बत ना सही
मैं तुम्हारी हूँ यही मेरे लिये क्या कम है
तुम मेरे होके रहो ये मेरी क़िस्मत ना सही
और भी दिल को जलाओ तो ये हक़ है तुमको
मेरी बात और है मैंने तो मुहब्बत की है।

       दूसरे गाने में प्रेमी को यह शिकायत नहीं कि प्रेमिका उससे इजहार नहीं कर रही। उसे शिकायत तब होगी, जब वो गैर को चाहेगी, यहाँ गैर शब्द और दुश्मन शब्द काबिल-ए-गौर है। जब प्रेमिका इस बुरी कदर दिल तोड़े कि गैर की बाँहों में नजर आए तो पीड़ा तो होगी
                                                                         इस गाने में एक अंतरा गौरतलब है। फूल की तरह हंसों, सबकी निगाहों में रहो, अपनी मासूम जवानी की पनाहों में रहो। फूल की खुशबू किसी खास के लिए नहीं होती, खुशबू सब ओर बिखरी रहती है लेकिन जब फूल किसी खास व्यक्ति के कोट में चढ़ जाता है तो उसकी खुशबू खत्म हो जाती है वो आम हो जाता है।  इस गाने में जान डाली है जमीला बानो ने अर्थात नूतन ने, वो इतनी टेलेंटेड अभिनेत्री थी कि उन्हें अपनी बात कहने के लिए जबान की जरूरत नहीं थी, वो आँखों में बोलती थीं। नायिका भेद के अध्येताओं को वो सारे लक्षण केवल इसी अभिनेत्री में मिल जाएंगे। सबसे खास बात है उनमें दुनिया के प्रति उत्सुक दृष्टि। सब मिलकर इस गाने के आसपास मायाजाल सा निर्मित कर देते हैं।
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कहते हैं कि साहिर, लता एवं एसडी बर्मन से एक रूपए अधिक मेहनताना लेते थे, साहिर को यह भान था कि वे जो काम कर रहे हैं वो साहिर के मान के लिए नहीं है वो गीतकार के मान के लिए है , धुन बनाना एवं उसे गाना बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन जब तक गहरे भाव नहीं होंगे, उनमें जान नहीं आएगी। धुन एवं गायन मूर्ति की तरह हैं लेकिन उसकी प्राणप्रतिष्ठा तभी होती है  जब गीतकार उसमें अपने भाव डाल देता है। साहिर ने दीदी का गाना सुधा मल्होत्रा से गवाया।  यह गाना किसी भी दृष्टि से किसी महान गायिका  से कम नहीं है।



                     

Wednesday, December 12, 2012

कोई अच्छा सा नाम....

इन दिनों मैं पितृत्व सुख का शिद्दत से आनंद ले रहा हूँ लेकिन इस सुख के साथ कई दायित्व भी मुझ पर आ गए हैं। लोग मुझे अभी से बिटिया की शादी को लेकर चिंतित कर रहे हैं लेकिन मुझे मालूम है कि इसमें तो अभी कई साल लगेंगे। तात्कालिक समस्या तो नाम को लेकर है। बिटिया का क्या नाम रखूँ?  नामकरण की समस्या इतिहास की बड़ी समस्याओं में से रही है। शेक्सपीयर ने अपनी एक कहानी का नाम रख दिया था जो तुम चाहो। अब मैं अभिषेक बच्चन की तरह भाग्यशाली तो नहीं हूँ कि मुझे नामों के ढेरों प्रस्ताव मिल जाएँ और मैं इनमें से एक आराध्या रख दूँ?
बेटा हुआ तो अचिंत्य
 मुझे आंधी फिल्म का एक दृश्य बहुत पसंद हैं। संजीव कुमार और सुचित्रा सेन बातें कर रहे हैं। संजीव कुमार कह रहे हैं कि एक बेटा हो जाने दो फिर देखता हूँ तुम्हें। फिर उनमें बच्चे के नामकरण को लेकर दिलचस्प बातें होती हैं और अंततः वे नाम तय करते हैं मनो। चूँकि यह मेरी मम्मी का नाम भी है इसलिए हो सकता है यह दृश्य मुझे अधिक प्रिय हो। हम लोगों ने भी बिटिया के जन्म के पूर्व इस तरह की सुखद बातें की थीं। मैंने सोचा था कि बेटा होगा तो उसका नाम रखूँगा अचिंत्य, क्योंकि वो शिव जी की आशीर्वाद से होगा, बिटिया होगी तो चित्राक्षी, जो मैना की तरह सुंदर आंखों वाली होगी और अपनी प्रिय बातों से हमें आनंदित करेगी। निधि ने जो नाम सोचे थे वो लड़का होने पर अमय और लड़की होने पर समिधा, अनुष्का।
सुंदर आँखों वाली चित्राक्षी
१७ अक्टूबर को जब छोटी गुड़िया हमारे जीवन में आ गई तब मैंने अनुभव को बताया कि मैं इसका नाम चित्राक्षी रख सकता हूँ तो वो काफी खुश हुआ क्योंकि उसे चिड़ियों से बहुत प्रेम है। फिर मैंने जब यह नाम सार्वजनिक किया तो लोगों का काफी विरोध हुआ। सबने कहा कि ये नाम बहुत कठिन है बच्ची इसे ले भी नहीं पाएगी।
मेघावती सुकर्णोपुत्री
मुझे एक स्पेशल सा अद्वितीय सा नाम चाहिए था। मैंने अपने उन दोस्तों से पूछा जिन्होंने हाल ही में संतान रत्न प्राप्त किया था। इनमें से एक नीटु ने अपने पुत्र का नाम लक्ष्य रखा। मैंने उसे कहा कि यह थोड़ा सा कॉमन नहीं लगा। उसने रोचक जवाब दिया कि भैया भारत की आबादी एक अरब हो चुकी है अब स्पेशल नाम कहाँ से मिलेगा। मुझे वैसा ही नाम चाहिए था जैसा मेघावती सुकर्णोपुत्री। सुकर्णो जब भारत आए थे तो उन्हें पुत्री रत्न प्राप्त होने की सूचना मिली, वे नामकरण की समस्या में फंसे, नेहरू ने कहा कि ये आषाढ़ के दिन आई है जब मेघ घिरे हैं तो इसका नाम मेघावती होना चाहिए।
श्रुतकीर्ति का विकल्प भी
मैंने दीपक से राय ली, दीपक ने एक नया नाम सुझाया, निसर्ग। मैं अक्सर लोगों से कहता हूँ कि मैं इसकी नोटशीट बनाकर निधि के पास प्रस्तुत करूँगा। मेरे दिमाग में दो नाम और हैं स्वस्ति और श्रुतकीर्ति। स्वस्ति का अर्थ होता है मंगलमय(जैसा मैंने पढ़ा है) और श्रुतकीर्ति शत्रुघ्न की पत्नी। आगे जो भी विचार आएगा, वो रख दिया जाएगा लेकिन विडंबना यह है कि जिसका नाम रखा जाना है उसे ही इस प्रक्रिया से दूर रखा जाता है।

Tuesday, December 11, 2012

खुशवंत को लिखते देखना अच्छा लगता है

सोचिए कि अगर आपका प्रिय लेखक लिखना बंद कर दे तो आपके लिए यह किस तरह का अनुभव होगा। पिछले एक महीने से खुशवंत सिंह के कॉलम न देखकर मेरे मन में उनकी तबियत के प्रति अज्ञात आशंकाएं होने लगी थीं लेकिन खुशवंत सचिन की तरह ही हैं जब भी आलोचक प्रश्न खड़े करते हैं वो अपनी उपस्थिति दिखा देते हैं। आज खुशवंत सिंह के तीन कॉलम हिंदुस्तान टाइम्स में पढ़े।
                                                                                                                 मैं ईश्वर से दुआ करूँगा कि खुशवंत हमेशा स्वस्थ रहें, उन्हें मौत भी नींद के झोंके में आए और अंत तक वे जोक के मूड में रहें। उनकी एक महिला प्रशंसक ने एक सूफी संत का धागा उन्हें दिया भी है जो उन्हें हमेशा स्वस्थ रखेगा।  वैसे उनका लेखन इतना व्यापक है कि वे हर दिन हमें याद आते रहेंगे।  परसों यहाँ की एक बुकशॉप में जाना हुआ था वहाँ मुझे यह सुखद आश्चर्य हुआ कि खुशवंत की अनेक पुस्तकों का हिंदी अनुवाद मौजूद हैं। खुशवंत के अलावा कोई भी ऐसा अंग्रेजी लेखक नहीं था जिसकी पुस्तकों का अनुवाद उनके यहाँ हो।
                                                                                                               खुशवंत का लेखन भारत के अभिजात्य तबके के बुद्धिजीवियों का इतिहास है। औपनिवेशिक दौर के अप्रवासियों से लेकर एनआरआई भारतीयों के अनुभव से उनके लेखन का गुलदस्ता सजा है। उनकी शाम की पार्टियाँ बेहद आकर्षक रहती होंगी, अपनी वाइन को लेकर नहीं, उस बौद्धिकता को लेकर जो इन महफिलों में अपने शबाब पर होती है। 
                                                                                                                                                   कोई मुझसे पूछे कि कामयाबी क्या है तो मैं ये कहूँगा कि किसी ने आपसे मीटिंग तय की है किसी डील के लिए नहीं, किसी सिफारिश के लिए नहीं, सौजन्य के लिए नहीं अपितु आपके सानिध्य का आनंद लेने के लिए। खुशवंत ऐसे ही हैं ऐसे बुजुर्ग जिनके साथ के लिए यौवन के पहली पायदान चढ़ने वाले युवा भी तरसते हैं।
                                                                                                                                                 मैं खुशवंत की तरह नहीं हूँ मैं स्ट्रेट फारवर्ड नहीं हूँ। लोगों से जल्दी घुलता-मिलता नहीं फिर भी वो मेरे प्रिय पत्रकार हैं। मुझे उनकी आध्यात्मिक रुचि बहुत पसंद है। वे धर्म की व्याख्या कठिन शब्दों में नहीं करते बल्कि सूफी रूहानियत में करते हैं।
                                    नेताओं को बिंदास गाली और व्यंग्य भी खुशवंत की खास विशेषता है जो उन्हें सबसे खास बनाती है। उनकी पत्रकारिता का जलवा इसी बात से पता चलता है कि जब उन्होंने मदनलाल खुराना पर अपने कालम में लिखा तो खुराना गदगद हो गए और पूरी मीडिया के सामने इसे भावुक स्वर में बताया।
                                                                                                                                            खुशवंत लिख रहे हैं ये हमारी खुशफहमी है भगवान करे, वे शतायु हों, वाहेगुरु उनके स्वास्थ्य की रक्षा करें।
        

Monday, December 10, 2012

स्कूल में पढ़ी हुई कहानियाँ

स्कूल में भेजने की क्या उम्र होनी चाहिए, मैं इस मामले में कुछ कहना नहीं चाहता लेकिन यह जरूर जानता हूँ कि कुछ विलक्षण बच्चों को छोड़कर अधिकांश बच्चों के दिमाग में शुरुआती सालों में कुछ भी नहीं घुसता। फिर भी जो चीज दिमाग में नहीं जाती, दिल में नहीं जाती वो भी गुत्थी की तरह स्मृति में जमा हो जाती है। मसलन क्लास १ में पढ़ी हुई प्यासा कौआ की कहानी, मेरी मम्मी बार-बार प्यासे कौवे की सूझबूझ का दृष्टांत देती लेकिन मुझे समझ में नहीं आता, बस इतना ही समझ में आता कि उसने पानी पीने में सफलता हासिल कर ली। जबकि मैं तो भावुक हो जाता था कि प्यासा कौआ किस प्रकार पानी प्राप्त करेगा। शिकारी के जाल में फंसे शेर को चूहे द्वारा निकाला जाना भी मुझे खास नहीं भाया, मन में ऐसा लगा कि हो सकता है यह इत्तफाक हो। फिर भी इन कहानियों में एक विलक्षण सी चीज होती थी इनके चित्र। मसलन प्यासा कौआ वाली कहानी का चित्र मुझे आज तक याद है शेर वाला भी
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अरसे बाद जब हड़प्पा सभ्यता में लोथल से मिली पुरातात्विक सामग्रियों के बारे में पढ़ा तो एक ऐसे बर्तन के बारे में पढ़ा जिसमें यह कथा अंकित थीं। यह चकित करने वाला अनुभव था, हर बार पीढ़ी-दर-पीढ़ी माताएँ अपने बच्चों तक इस कथा का श्रवण करती गईं। पंचतंत्र के संग्रहक ने ऐसी बहुत सी कहानियाँ सुनी होंगी और स्टोरी टेलिंग के अपने खास अंदाज में इन्हें परोसते चले गए होंगे।
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बचपन में सबसे खास कहानी जो पढ़ी थी वो थी हरपाल सिंह नामक एक युवक की कहानी जिसे एक बूढ़े ने पाँच सलाह दी थी। मुझे दो सलाह अब तक याद है पहली जहाँ कहीं भी ज्ञान की बात सुनने मिलें, वहाँ रुक जाओ तथा कभी ऐसी बात न कहो जिससे किसी का दिल दुखे। दूसरी सलाह बडे़ काम की थी, हरपाल सिंह को राजा के काफिले में शामिल कर लिया गया था, चारों ओर रेगिस्तान था, अंततः एक बावली आई। इस बावली में एक युवती थी जो अपने पति की हड्डी बन चुकी लाश को लिए हुए खड़ी थी। जो भी पानी लेने आता उसे पूछती कि यह दिखने में कैसा है लोग हँस देते और वो उन्हें पानी पीने से रोक देती। राजा के कारिंदे पानी लाने में विफल हो गए। अंततः हरपाल सिंह पहुँचा, उसने कहा कि ये तो बहुत सुंदर है। युवती खुश हो गई और उसने हरपाल सिंह को पानी ले जाने की इजाजत दे दी
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यह कहानियाँ उस समय समझ नहीं आई थीं लेकिन ये जेहन में कैद हो गई थी। मैंने कभी बावड़ी नहीं देखी थी। उस चित्र में बावड़ी को देखना अच्छा लगा। अरसे बाद एक भक्त के प्रश्न के उत्तर में रविशंकर महाराज से कहते हुए सुना कि जब हम बच्चे को बताते हैं कि भगवान ऊपर रहता है तो वो न तो इंकार करता है और न ही स्वीकार करता है वो अपने मन में रख लेता है। इन कहानियों को भी हम लोगों ने अपने मन में बसा लिया।
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हरपाल सिंह की कहानी का मेरे जीवन में विशेष महत्व है। मेरे एक दोस्त को मैंने यह पुरानी कहानी सुनाई, उसे भी याद थी और उससे वादा लिया कि हमेशा बूढ़े की पाँच बातें अपने जीवन में अमल करेगा। अब तक वो हरपाल सिंह की राह पर चल रहा है भगवान करें आगे भी वो इसी राह पर चलता रहे।