Friday, May 25, 2012
यम तुम ऐसे तो नहीं थे..
सहसा मुझे लगा कि यम तुम कितना बदल गए
तुम कितने दयालु थे सुहागिनों के लिए दे देते थे कितने आशीष...
अपनी बनाई हुई मर्यादाओं को भी देते थे छोड़...
सुहागिनों को सुहागवती होने का वर देते थे खुशी से...
फिर सहसा तुम्हे क्या हुआ...
कभी भी तोड़ देते हो नेह की डोर..
बिना बताए, बिलखने छोड़ देते हो सुहागिनों को
तुम्हें उनकी चूड़ियों की खनखनाहट अब बुरी लगने लगी है न
क्या तुम्हें अब गर्मियों में उनका अपने सत्यवान के लिए गिड़गिड़ाना बुरा लगने लगा है...
तुम इतना क्यों बदल गए यम
Monday, April 23, 2012
एलेक्स के लिए....
Monday, December 5, 2011
क्यों अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे जीना...
88 की उम्र में टि्वट करते थे देवानंद
फिक्र को धुंए में उड़ाते जुट जाते थे नई फिल्म की शूटिंग के लिए
82 की उम्र में डायलिसिस करा सीधे सेट पर पहुँचते थे शम्मी
भारत के अगले रॉकस्टार को तैयार करने का जुनून
दिखता था उनके अंदर
82 में ही आडवाणी निकालते हैं लंबी रथयात्रा
घंटों खड़े स्वीकार करते हैं अभिवादन जनता का
पीएम बनने का सपना युवा जो है
100 की उम्र में मैराथन दौड़ते हैं फौजा सिंह
बढ़ती उम्र से पैदा होने वाली निराशा को पीछे छोड़ते हुए
और 82 की उम्र में ही मेरे बड़े पिता जी
मंदिर में गिरने से पैर टूटने के बाद
फिर जाने लगे हैं मंदिर
78 की मेरी बुआ
कमर टूटने के बाद फिर खड़ी हो गई है
शहर छोड़कर वो जा रही है उसी गाँव में,
जहाँ उसकी कमर टूटी थी।
86 की मेरी बुआ
हड्डियाँ टूटने के इतने समाचार सुनकर
चिंतित होकर कहती हैं ये इतने अधीर क्यों हैं
शांति से बैठें तो जी लेंगे कुछ और दिन...
सबको जीना अच्छा लगता है
क्यों अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे जीना..
Tuesday, November 15, 2011
डिबिया में बंद जिंदगी
Tuesday, November 1, 2011

रौशन होर्डिंग्स में सुंदरियों की मुस्कानरेखा देखते हुए,
जब मैं राजधानी की रेशमी सड़कों से गुजरता हूँ,
सिविल लाइन में बने भव्य बंगलों से गुजरते हुए,
उनके इंटीरियर की तुलना गोथिक शैली से करता हूँ,
अबाधित ब्राडबैंड स्पीड के बीच जब फेसबुक के फीचर की तुलना गूगल प्लस से करता हूँ,
टैक सेवी होने का दंभ भरता हूँ,
सिटी मॉल में आइनाक्स में बैठा हुआ स्विट्जरलैंड के नजारे देखता हूँ,
तब सोचता हूँ कि मैं कितने खुशकिस्मत समय में हूँ?
यद्यपि मेरी किस्मत में फूल नहीं, उनकी खुशबू जरूर है
जैकपॉट खुला होता तो हैरिटेज होटल और रिसार्ट्स की तफरीह भी हो पाती,
एक पाँव जमीं में और एक आसमान पर होता,
इतना खुशकिस्मत समय?
फिर भी कुछ लोग क्यों इस समय को कोस रहे हैं,
ऐसे समय को जन्नत है जो एचजी वैल्स की टाइम मशीन को जीता है,
क्या वो उन जंगलों की चिंता कर रहे हैं जहाँ के बाशिंदे अब एंटीक पीस बनने जा रहे हैं हमारी दुनिया के लिए नुमाइश की चीज...
क्या उन्होंने बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट में बने फार्मूला वन रेस ट्रैक की भव्यता को नहीं देखा?
क्या उन्होंने सर्किट में पॉप गायिका गागा को गाते हुए नहीं सुना?
सर्किट में सिद्धार्थ माल्या की बाँहों में झूलती दीपिका पादुकोण की अदाएँ उन्हें क्यों नहीं भातीं?
उन्हें आखिर कब समझ आएगा कि सिद्धार्थ के पिता विजय माल्या ने गाँधी की घड़ी खरीद ली है और अब समय भी उनका है?
इतने खुशकिस्मत समय में वो रुदालियों की तरह प्रलाप क्यों कर रहे हैं?
(बर्तोल्त ब्रेख्त की भयानक खबर की कविता से प्रेरित, अनुभव को शुक्रिया जिसने मुझे फिर से कविता लिखने की प्रेरणा दी)
Wednesday, September 21, 2011
सैन्योरिटा जिंदगी न मिलेगी दोबारा का सुंदर गाना

Quien eres tu? (Who are you?)
Donde has estado? (where have you been?)
He removido cielo y tierra y no te encontre
(I moved heaven and earth and not find you)
Y llegas hoy (but you arrive today)
Tan de repente (So suddenly)
Y das sentido a toda mi vida con tu querer
(and give meaning to my life with your love)
Sunday, September 11, 2011
मेरी त्र्यंबकेश्वर यात्रा(भाग 1)

रायपुर से मुंबई की ओर ट्रेन रूट में की गई यात्रा में मेरे लिए अक्सर आकर्षण का केंद्र होता है डोंगरगढ़ के बाद शुरू होने वाले घने जंगल। मुझे भूगोल की जानकारी नहीं तो केवल अनुमान लगाता हूँ कि ये या तो मैकल पर्वत श्रेणी के होंगे या दंडकारण्य के महान पठार के हिस्से। दुर्भाग्य से उस दिन की रात चाँदनी नहीं थी, अब जंगलों में वैसे जुगनू भी नहीं जिनसे अंधेरी रातें भी गुलजार होती थीं। कुछ सालों पहले मैंने इसी जंगल में सैकड़ों जुगनुओं को देखा था। ऊपर आकाश में तारे दिख रहे थे और नीचे जुगनू। पाकीजा का एक गाना याद आता है जुगनू हैं या जमीन पर उतरे हुए हैं तारें। सुना है कि पहले अरबी लोग इन जुगनुओं को एक काँच के डिब्बे में रख देते थे, रात में डिब्बे में भरे हुए सैकड़ों जुगनू टार्च की तरह काम करते थे। शहरों में रहने वाले हम लोगों को प्रकृति की कितनी थोड़ी जानकारी होती है इसका मुझे तब पता चला, जब मैंने और मेरे दोस्त ने पहली बार दिन में जुगनू देखा। वो हरे रंग का था, हम लोगों ने कहा कि हमने एक नया कीड़ा खोजा है। इसका नाम रखा सोकव। बाद में पता चला जिसे हम लोगों ने सोकव समझा वो तो जुगनू था। चाँदनी रातों में इन जंगलों से गुजरना अद्भुत अनुभव होता है। चाँदनी का मद्धिम प्रकाश पेड़ों और झरनों में गिरता है और पूरे जंगल में एक अजीब सन्नाटा छाया रहता है। शायद जंगल में मौजूद होने से ज्यादा बेहतर ट्रेन के भीतर से इसे देखना है क्योंकि तेज ठंडी हवाओं का थपेड़ा हमें और आनंदित करता है। खिड़की वाली जगह का बचपन का लालच हर बार जाग जाता है। महाराष्ट्र के भीतर प्रवेश करने पर यदि हम सड़क मार्ग से जाएँ तो शायद धुलिया के आसपास से सहयाद्री की श्रृंखला शुरू हो जाती है और यह अद्भुत अनुभव होता है। एक दशक पहले सड़क यात्रा में कवर किये गए कुछ शहर याद आते हैं। एक कस्बे में हमारी गाड़ी रूकी थी। छोटा कस्बा था पहाड़ियों से घिरा। पहली बार आए थे लेकिन ऐसा लगा कि पहले भी इस कस्बे से परिचय रहा। खैर जब नासिक पहुँचे तो स्टेशन छोटा सा लगा लेकिन शहर में पहुँचते ही लगा कि यह बड़ा शहर है और व्यवस्थित भी। त्र्यंबकेश्वर यहाँ से संभवतः ४० किमी दूर है। प्राचीन ज्योतिर्लिंग के अलावा यहाँ गोदावरी का उद्गम भी है। बताते हैं कि त्रिम्बक की पहाड़ियों से गोदावरी निकलती है। त्र्यंबकेश्वर में एक धारा दिखी लेकिन इतनी गंदी धारा थी कि लगा ही नहीं एक महान नदी की शुरुआती यात्रा यहाँ से हो रही है। रास्ते भर पहाड़ की तलहटी ने हरी घास की चादर ओढ़ ली थी। पास ही त्रिम्बक की मेघाच्छादित पहाड़ी दिख रही थी। नासिक से त्र्यंबकेश्वर के बीच एक छोटा सा पहाड़ी गाँव पड़ता है अंजनेरी। नासिक में अपने जीजाजी के घर जब मैं रुका तो उन्होंने अंजनेरी पर आधारित मिथक कथा की जानकारी मुझे दी। उन्होंने मुझे बताया कि अंजनेरी में हनुमान जी का जन्म हुआ था। यहाँ तक पहुँचने का रास्ता काफी कठिन है वे भी अरसे से नासिक में रहने के बाद पहली बार पिछले साल ही अंजनेरी जा पाये थे। त्र्यंबकेश्वर में रुकते ही सबसे पहले हम लोग गजानन धर्मशाला में ठहरे। यह शेगाँव वाले गजानन महाराज की धर्मशाला है। इतने सस्ते किराये में सुंदर कक्ष वाली संस्थान की धर्मशाला अन्य धार्मिक संस्थाओं के लिए आदर्श है कि किस प्रकार चढ़ावे के धन का बेहतर उपयोग उन भक्तों के लिए किया जा सकता है जो भक्ति भावना तो रखते हैं लेकिन जो सुदामा की तरह दीन-हीन होते हैं और अपने प्रभु के दर्शन के लिए लंबी कष्टप्रद यात्रा तय करते हैं। धर्मशाला की एक और विशेषता मैंने देखी, यहाँ सभी आर्थिक वर्ग के लोग थे, असली समाजवाद ऐसी ही जगहों में दिखता है जहाँ सब एक से लगें, कोई छोटा-बड़ा नहीं। रूम की टैरेस से हमें वो पहाड़ी दिखती थी जहाँ से गोदावरी की बहुत सी धाराओं में से एक धारा निकली थी।
स्नान करने के उपरांत हम मंदिर गये, त्र्यंबकेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। पौराणिक कहानी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन यह जरूर पता चला कि इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। मंदिर की भव्यता महाकाल मंदिर की यादें ताजा करा देती है। भीड़ बहुत थी और भीड़ में मेरा दम घुटता है शायद फोबिया अधिक है सच्चाई कम है। इसलिए थोड़ा असहज महसूस हुआ। फिर सुबह जाना था, भीड़ में हुई परेशानी ने मानसिक रूप से थकाया और भोजन की भी उचित व्यवस्था नहीं थी, इसके चलते परेशानी कुछ और बढ़ी। सुबह के समय शिव जी के अच्छे से दर्शन हुए, फिर हमने परिक्रमा की। इसके बाद साढ़े आठ बजे तक का इंतजार किया। मुझे आशंका थी कि इतनी देर कैसे बैठ पाऊँगा पूजा-वेदी में, लेकिन भगवान की कृपा थी और पूजा करने के दौरान बहुत अच्छा अनुभव हुआ। पंडित जी के घर के तीसरे माले में पूजा हुई। वहाँ घर से वही त्रिम्बक की पहाड़ियाँ दिख रही थीं। इन्हें देखकर लग रहा था कि रास्ता बड़ा लंबा और कठिन है लेकिन असंभव नहीं। नेहरू ने भी लिखा था न अक्सर हमें आलोकित पर्वत शिखरों को प्राप्त करने के लिए थमी अंधेरी घाटियों से गुजरना होता है। लंबे समय से अंधेरी घाटियों से गुजर रहे हैं लेकिन रुके भी तो नहीं है। हौसलों का दिया बूझता प्रतीत होता है लेकिन संकल्प शक्ति भी है मन में, जिससे ये लड़ाई छेड़े हुए हैं। खैर वैदिक रीति से की गई पूजा ने एक बार फिर परंपरा में वापस लौटा दिया। अक्सर ऐसी पूजा के समय मुझे निर्मल वर्मा द्वारा लिखा शब्द याद आता है जब कोई हिंदू अपने संबंधियों की अस्थियाँ हरिद्वार में गंगा में बहाता है तो उसे वैसा ही अनुभव होता होगा जैसा यूनानियों को कैथार्सिस की सम्पूर्ति पर होता होगा।
इतिहास की पढ़ाई ने काफी कुछ दिया है लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया है जैसाकि जेम्स जॉयस ने लिखा है कि इतिहास वह दुःस्वप्न है जिससे मैं जागने की कोशिश करता हूँ। अक्सर इसके चलते अपनी मान्यताओं पर शक भी हो जाता है। शायद बीते हुए समय में ऐसा होता होगा कि हम अपनी मान्यताओं पर टिके रहते होंगे लेकिन अपनी बदहाली का कारण अपने उन पापों अथवा अज्ञात कारणों पर छोड़ देते होंगे जो हमें भी नहीं मालूम। फिर भी जैसे खंडित देवता की पूजा नहीं होती, वैसे ही अगर आपके व्यक्तित्व में कुछ खंडित अंश रह गया तो उसकी भरपाई नहीं हो पाती और ये जीवन भर सालने वाली बात रहती है। मैं बहुत विषयान्तर कर रहा हूँ लिखते हुए लेकिन ये अनुभव मेरी उस यात्रा से भी जुड़े हुए हैं जिसे यात्रा के दौरान मैंने लगातार महसूस किया।

