Tuesday, March 12, 2013

यात्रा और जीवन का फलसफा




 मैंने तीन कहानियाँ ऐसी सुनी हैं जिन्होंने मेरा यात्राओं के प्रति नजरिया बदला है। सबसे पहले बीगल नामक जहाज में निकले डार्विन की यात्रा। जब वे दक्षिण अमेरिका में टीरा के घने जंगलों से गुजर रहे थे तो उन्होंने एक मादा गोरिल्ला को स्वयं बर्फ झेलते हुए अपने बच्चे की रक्षा करते हुए दूध पिलाते देखा। डार्विन ने इसी क्षण समझ लिया कि मनुष्य के सबसे निकट के पूर्वज यही हैं। दूसरा विवेकानंद की रायपुर यात्रा है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने प्रकृति को निकट से देखा और प्रथम आध्यात्मिक अनुभूति उनकी यहीं हुई। तीसरी यात्रा भारतेन्दु की पुरी यात्रा है। इस यात्रा ने उन्हें इस तरह आंदोलित किया कि सहस्त्राब्दि भर की काव्य यात्रा को स्थगित कर उन्होंने गद्य में हाथ आजमाने का निर्णय लिया।
                 मेरी वृत्ति यायावर की नहीं है। वो नये-नये स्थल चुनता है। मैं बार-बार उन्हीं जगहों में लौटना पसंद करता हूँ इसलिए नई जगह देख नहीं पाता, इसलिए मेरा अनुभव-जगत भी सीमित ही रह जाता है। फिर भी क्षणिक यात्राओं में ही सही, कई बार जीवन जीने के फलसफे मिलते हैं, इस बार शिर्डी-नासिक यात्रा से वापस लौटने के दौरान ऐसा ही हुआ। मैं खिड़की के किनारे बैठा था, शाम का सूरज ढल रहा था। ट्रेन की स्पीड काफी तेज थी। महाराष्ट्र के ग्रामीण परिवेश का खूबसूरत लैंडस्कैप आँखों के सामने से तेजी से गुजर रहा था। मुझे अचानक डिस्कवरी चैनल में देखा हुआ स्टीफन हॉकिंग का एक प्रोग्राम याद आ गया। उसकी विषयवस्तु कुछ यूँ थी, पूरे विश्व में एक ऐसी ट्रैक बनाई जाए जिसमें चलने वाली ट्रेन की स्पीड बढ़ाने के पूरे वैज्ञानिक इंतजामात किए जाए, प्रकाश के वेग के करीब पहुँचने पर इस बात की पूरी संभावना बनेगी कि इस ट्रेन के टूरिस्ट इस आकाशगंगा का थोड़ा सा हिस्सा घूम आएँ। यह सोचना काफी दिलचस्प है भविष्य में हो भी सकता है कि ऐसी ट्रेन बनें लेकिन निश्चित ही हम उसके यात्री नहीं हो पाएंगे। यह ख्याल आते ही मुझे यह महसूस हुआ कि आकाशगंगा न सही, इस यात्रा के बहाने ही हम ऐसी ट्रेन में सवार हैं जो इस सुंदर पृथ्वी के बहुत छोटे से हिस्से की सैर हमें करा रही है। अगर पुनर्जन्म न होता हो तो हमारे पास यह अंतिम मौका है इस सुंदर धरती को घूमने के लिए। हम अपने विषादों और चिंताओं में अपना जीवन नष्ट न करें, इस सुंदर मौके का इस्तेमाल करें।
                             ट्रेन जब सेवागांव से गुजरी तो गांधी जी की भी एक स्मृति उभर आई। गांधी फिल्म का दृश्य है। वे खंभात की खाड़ी में खड़े समुद्र की लहरों को देख रहे हैं और कस्तूरबा से कह रहे हैं कि सोचता हूँ कितनी दूर चला आया हूँ और अभी कितनी नई मंजिलें तय करनी है। मेरे हिस्से में अब तक थोड़ी ही यात्राएँ आई हैं और अपनी किस्मत को कोसते हुए मुझे कतील शिफाई की नज्म याद आ रही है।
छोटे बच्चों ने छू भी लिया चांद को, बड़े-बूढ़े कहानियां सुनाते रह गए..........
                            
                                                           

Sunday, March 10, 2013

काइ पो चे और चेतन भगत......




काइ पो चे देखने से एक दिन पूर्व मैं यहाँ पुराने बस स्टैंड स्थित पारख बुक डिपो में किताबें देखने गया था। वहाँ से मैंने अज्ञेय की एक पुस्तक ली, अरे यायावर रहेगा याद। किताब की पेमेंट करते हुए मैंने देखा कि एक महाविद्यालयीन छात्रा जो अपने पिता के साथ आई थी, ने चेतन भगत की एक पुस्तक ली।
                                            मैंने सोचा कि पीढ़ी के एक दशक के अंतर ने कितना कुछ बदल दिया है। हमारे समय में सलमान रूश्दी, विक्रम सेठ और झुम्पा लाहिड़ी युवा वर्ग की रुचि के केंद्र में नहीं थे। गुनाहों का देवता जैसे उपन्यास लिखने वाले धर्मवीर भारती जैसे लेखकों को वे पढ़ना पसंद करते थे। क्लासिकी के परे नॉवेल्स की अलग दुनिया थी जिसमें गुलशन नंदा जैसे लेखकों का राज चलता था।
                                             कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि चेतन भगत नहीं होते तो क्या नई पीढ़ी किताबों की दुकानों में आती ही नहीं?  चेतन की उपलब्धि है कि उन्होंने सोशल मीडिया से जुड़ी पीढ़ी को किताबों की लत लगा दी है। अब जब वे चेतन को पढ़ चुके हैं तो विक्रम सेठ को भी पढ़ेंगे और नायपाल जैसे महान लेखकों तक उनकी पहुँच आसान हो पाएगी।
                                     फिर भी किसी एक लेखक की दीवानगी के नकारात्मक असर भी हो सकते हैं। इसका उदाहरण मैंने चेतन भगत के एक प्रशंसक से ही जाना। हुआ यूँ कि अनुभव ने मुझे जयपुर लिटररी फेस्टिवल में हुए एक किस्से की जानकारी दी। फेस्टिवल के दौरान एक मौका ऐसा आया जब चेतन भगत और गुलजार एवं अन्य लेखक प्रेस से मुखातिब हुए। मोर्चा चेतन भगत ने संभाला, उन्होंने कहा कि गुलजार अच्छा लिखते हैं मैंने उन्हें पढ़ा है। चेतन को लगा कि उनके द्वारा दिया गया प्रतिभा का सर्टिफिकेट गुलजार को खुश करेगा, आखिर उन्होंने इतनी जल्दी अपनी फैन फॉलोविंग तैयार की है जो किसी भी पुरानी पीढ़ी के लेखक के लिए ईर्ष्या का विषय हो सकती है? चेतन की टिप्पणी ने गुलजार ही नहीं, लिटरेरी फेस्टिवल में आए तमाम लेखकों के लिए झटके का कार्य किया? गुलजार ने केवल इतना कहा कि चेतन मेरा मूल्यांकन कर सकते हैं बशर्ते कजरारे गीत के बोल तेरी बातों में किमाम की खुशबू है तेरा आना भी गर्मियों की लू है का अर्थ बता दें। गुलजार ने अपनी एक ही टिप्पणी से चेतन को ध्वस्त कर दिया था। किसी लेखक की लोकप्रियता का पैमाना उसके पाठकों की संख्या नहीं होती, उसके लिखे की गहराई से ही उसका आकलन किया जा सकता है। चेतन भगत और गुलजार में अगर तुलना करता हूँ तो छत्तीसगढ़ी की एक कहावत याद आती है लोड़हा कहाय, मैं महादेव के भाई।
                                      यह किस्सा मुझे बहुत भाया और मैंने नेट में इसकी सर्च की। दो परिणाम निकले, एक में न्यूज पर कमेंट की व्यवस्था भी थी। न्यूज से व्यथित होकर चेतन के एक प्रशंसक ने लिखा कि चेतन कभी आलोचनाओं की परवाह मत करो, पुरानी पीढ़ी के थके हुए लोग तुम्हारी प्रतिभा से ईर्ष्या करेंगे, उन्हें जलने दो, तुम बढ़ते जाओ। इस कमेंट पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ, शायद इस युवक ने कभी गुलजार की नज्म नहीं सुनी होगी अथवा गुलजार की कवित्व की गहराई की थाह नाप पाने की समझ उसके भीतर नहीं होगी।
                                   व्यक्तिगत रूप से मुझे चेतन से कोई नाराजगी नहीं, हो सकता है कि वे उस समय भाषा का प्रयोग करने में सजग न रहे हों, उन्होंने युवा वर्ग को अपनी आवाज दी है, उनकी भाषा में कैंपस की खुशबू है उनके पात्र मस्ती की पाठशाला से आते हैं। कुछ कर गुजरने का जज्बा उनके भीतर होता है। काइ पो चे उनकी पुस्तक थ्री मिस्टेक्स ऑफ माइ लाइफ पर आधारित है।
                                                   निर्देशक के ऊपर किसी फिल्म का कितना दारोमदार होता है यह पता चलता है काइ पो चे और थ्री इडियट को देखकर। दोनों ही युवाओं की कहानी लेकिन एक ऐसी कहानी जिसमें मनोरंजन और मेसेज कहीं भी अलग-अलग नहीं दिखते, जो कला राजू हीरानी में है वो अभिषेक कपूर में नहीं। काइ पो चे का पहला हिस्सा मरा-मरा सा लगता है। जो रुचिकर है वो दीव के कुछ दृश्य जो दोस्त छुट्टी में बिताते हैं।
                                 फिल्म की असल उपलब्धि दूसरे भाग में है। दंगों के असल दर्द को न तो अखबारों की सुर्खियों में महसूस किया जा सकता है न किसी कट्टरपंथी नेता के भड़काऊ भाषण में। इस पीड़ा को कला के सजीव माध्यम में महसूस किया जा सकता है, सिनेमा के पर्दे में इसे जिया जा सकता है। काइ पो चे यह संदेश देने में सफल हुई है। पहले गोधरा और फिर हुए गुजरात दंगे। दंगों में उभर आने वाले इंसानी वहशियत को उभारने में फिल्म पूरी तरह सफल रही है।
                                                          इस फिल्म ने बॉलीवुड को एक नया हीरो भी दिया है सुशांत राजपूत, इस युवा में बहुत जोश है और एक्टिंग में जान लाने के लिए जरूरी इमोशन भी। इसका अंदाज भी बनावटी नहीं, एक आम युवा की सहजता इसके भीतर है। अब जब चेतन भगत के सारे उपन्यासों पर बॉलीवुड फिल्म बना चुका है आशा की जानी चाहिए कि वो विक्रम सेठ, अमिताभ घोष और अरविंद अडिगा पर भी दृष्टि डालेगा और इसी बहाने किताबों की दुकानें भी गुलजार हो जाया करेंगी।

Thursday, March 7, 2013

पनवारः एक बचपन का स्वप्न






तब जमीन में पंगत लगाई जाती थी और कढ़ी तथा पूड़ी का आकर्षण होता था। जो पंगत में बैठते थे, उनकी विशेष खातिरदारी होती थी। अब तो शादियों में मेजबान से पहली और आखरी बार सामना प्रवेश द्वार पर ही होता है। शादियों में खाना रस्मी अधिक लगता है उसमें वैसा स्वाद नहीं होता। बिठाकर खिलाने में भी अतिविशिष्ट व्यवस्था पनवार की होती थी, लड़के के पक्ष के चुनिंदा वरिष्ठजनों को बिठाकर विशेष भोजन कराया जाता था। अंतिम बार मैंने पनवार का आयोजन अपनी बहन की शादी में २००१ में देखा था। मेरे लिए गौरव की बात थी कि मुझे इसमें परोसने का मौका मिला जो एक दुर्लभ सम्मान होता है। इसके लिए आपको धोती पहननी होती है और आचरण में विशेष संयम का ध्यान रखना होता है। बताते हैं कि पहले पनवार के दौरान निभाई जाने वाली और भी रस्में होती थीं लेकिन धीरे-धीरे ये समाप्तप्राय हो गईं।
                                                 जब हम छोटे थे तब पनवार के ढेरों किस्से सुनने मिलते थे। यह हमारा बचपन का सपना था कि हम भी बड़े हों और हमें भी इस अतिविशिष्ट व्यवस्था का लाभ मिले। मेरे चाचा कहते थे कि इसके लिए तुम्हें लंबा इंतजार करना पड़ेगा। बिट्टू की शादी के पहले यह संभव नहीं। मुझे लगता कि काफी लंबा समय मुझे पनवार के लिए इंतजार करना होगा। बिट्टू मुझसे दस साल छोटा है और अब तक अविवाहित है लेकिन इधर के कुछ वर्षों में मैंने कहीं पनवार का आयोजन नहीं देखा। बचपन का स्वप्न अब शायद ही पूरा हो।
                                                  सफल पनवार का आयोजन वधू पक्ष के लिए बड़ी चुनौती होती थी? बाराती पक्ष में हमेशा समधीजनों में एक न एक विध्नसंतोषी होते थे, उन्हें संतुष्ट करने के लिए हर प्रकार के व्यंजन उपलब्ध करा पाना और परोसने की त्वरित व्यवस्था सुनिश्चित कराना बड़ी चुनौती होती थी। गांधी की तरह ही वे नमक के लिए बखेड़ा न कर दे, इसके लिए थाली में अलग से थोड़ा स्पेस नमक के लिए होता था, यह व्यवस्था छोटे रेस्टॉरेंटों में अभी तक चल भी रही है।
                                                         पनवार की स्पेशल डिश में जिमीकंद की खास जगह होती थी। मेरी मम्मी ने बहन की शादी के पूर्व एक बड़े जिमीकंद को विशेष तौर पर पसंद किया था, वो जिमीकंद किचन में महीने भर तक रखा रहा और अंत में पनवार के दिन उसकी शहीदी दी गई। हाल ही में विधानसभा में लंच ब्रेक के दौरान खाने में जिमीकंद की सब्जी भी मिली लेकिन कढ़ी और बड़ा के बिना जिमीकंद का आनंद बेमानी सा लगा।
                        पनवार का विशेष आकर्षण खाने के रसिकों के वीरोचित किस्सों को लेकर था। जब छत्तीस से अधिक व्यंजन थाली में हो तो सबको खत्म करना विशेष चुनौती होता था। इसमें वे सफल माने जाते थे जो सभी व्यंजनों को खत्म कर थाली उलट देते थे। अतिविशिष्ट जनों में से केवल एक या दो ही ऐसा कारनामा कर पाने में सफल होते थे। मेरे एक स्वर्गीय बड़े पिता जी ने ऐसा कारनामा हर पनवार में किया था और अब भी जब उनका जिक्र आता है तो दो ही बातों को लेकर, एक तो तब जब वे भारत-चीन युद्ध के दौरान चकमा देकर वारफ्रंट से लौट आए थे और दूसरा पनवार को लेकर।
आश्चर्य की बात है कि मुस्लिमों में भी दस्तरख्वान की परंपरा तेजी से खत्म हो रही है। एक मुस्लिम शादी में हाल ही में जाना हुआ। वहाँ कुछ टेबल लगाए गए थे स्पेशल खाना सर्व करने के लिए लेकिन जमीन में बैठकर दस्तरख्वान जैसी बात उसमें नहीं थी। मैंने यह दृश्य द ग्रेट मराठा सीरियल में देखा था। पानीपत लड़ाई में विजय के बाद अब्दाली की महफिल ऐसी ही दस्तरख्वान से सजी थी। इसका आनंद ही अलग होता होगा। मुझे लगता है कि चाहे हिंदू हो या मुसलमान, इनकी जड़े तो कबायली ही हैं और कबायली संस्कृतियों में सामूहिक भोज एक तरह से उत्सव की तरह ही होता होगा, जहाँ लूट के माल का बंटवारा होता होगा तथा साथ ही सामूहिक खान-पान भी होता होगा। वो श्लोक याद आता है देवाभागं यथापूर्वे संजानना उपासते।
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पनवार की मौत एक तरह से छत्तीसगढ़ी खाने की भी मौत है। उसके मेन्यू का निर्धारण विशेष रूप से होता था। कई विशेष प्रकार की सब्जियाँ और व्यंजन खासतौर पर पनवार के लिए बनाए जाते थे। अंतिम रूप से जिस पनवार को मैंने देखा था, उसमें अधिकांश मटेरियल बाहर सजी खाने की मेजों से लाकर थालियों में सजा दिया गया था और रसिकों की चाह पर जिमीकंद की सब्जी लगा दी गई थी। उस दिन नहीं मालूम था कि मैं अंतिम बार पनवार का आयोजन देख रहा हूँ।

Monday, March 4, 2013

हमारी सामंती मानसिकता





हत्या को कमोडिटी बनाकर पेश करने वाले हमारे समाचार चैनलों को अरसे से देखते हुए मेरी संवेदनशीलता भोथरा गई है इसका मुझे गहरा दुख होता है लेकिन खोई संवेदनशीलता को वापस लाने का कोई उपाय मेरे पास नहीं।
                                                 फिर भी कभी ऐसी भी घटना होती है जो उद्वेलित करती है। आज सुबह कुंडा के एसओ जिया-उल-हक की हत्या ने ऐसा ही दुखी किया। उनके दोनों पैर में गोली मारी गई, जाहिर है मारने से पहले उन्हें खूब प्रताड़ित भी किया गया होगा। उनकी बेवा चीख-चीख के कह रही है कि जब तक अखिलेश खुद नहीं आएंगे तब-तक अपने पति को सुपूर्द-ए-खाक नहीं करने देगी।
                                                            घटना के बाद बाहुबली विधायक और मंत्री पर मुझे अधिक गुस्सा नहीं आया। मुझे गुस्सा तो उस जनता से है जो इस विधायक को २० साल से चुन रही है। इसके बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं पता नहीं कितना सच है लेकिन बड़ी भयावह है जैसे इसके महल के पीछे एक तालाब है जहाँ मगरमच्छ रहते हैं और खिलाफत में आवाज उठाने वाले विरोधियों की लाश इस तालाब में पनाह पाने फेंक दिए जाते हैं। यूपी में बाहुबलियों के कई ऐसे ही किस्से प्रचलित हैं। दिल्ली में मेरे मित्र बन गए एक आला पुलिस अधिकारी के बेटे ने मुझे बताया था कि अंसारी ने जेल के भीतर एक ऐसी पार्टी की थी जिसमें शराब की नदियाँ बहाई गई थी और फाइव स्टार होटल से डिनर के इंतजामात किए गए थे। उसने बताया कि उसे खास तौर पर इनवाइट किया गया था लेकिन पिता पर कोई ऊँगली न उठा दे, इस वजह से वो लुत्फ नहीं ले पाया। इसके ही कजिन ब्रदर ने मुझे आश्वासन दिया था कि पीसीएस में इंटरव्यू तक पहुँच जाने पर एक पोस्ट की व्यवस्था करेगा। उसे मेरे बारे में बहुत दुख होता था, वो कहता था कि प्रशासन में दबंगई बहुत जरूरी है। सलेक्ट होने के बाद भी लाइफ का एन्जॉय नहीं कर पाओगे।
                                                  अगर हम कहें कि यह समस्या केवल यूपी की है तो यह गंभीरता से किया गया आकलन नहीं होगा। छत्तीसगढ़ में भी एक ऐसा राजपरिवार है जहाँ पहली पोस्टिंग पर कलेक्टर को अपना ऑफिस संभालने से पहले दरबार में हाजिरी लगानी होती है। संयोग की बात यह है कि यह परंपरा राजा ने शुरू नहीं कि अपितु उनके चमचों ने ही यह नियम बना दिया। आंध्रप्रदेश में वायएसआर के बेटे के पीछे आम जनता की दीवानगी भी इसका उदाहरण है। छापे में करोड़ों बरामद होने के बाद भी जनता इस युवा और अनुभवहीन नेता के साथ है। तमिलनाडू में कमोबेश जयललिता और करुणानिधि के जाहिर से भ्रष्टाचार के बाद भी जनता लैंडस्लाइट विक्ट्री से उन्हें नवाजती है।
                                      इसका कारण साफ है कि बाहुबलियों का संरक्षण हमें भी भाता है। हम चटखारे लेकर उनके द्वारा दिए गए आश्वासनों को पब्लिकली बयां करते रहते हैं और वे फलते-फूलते हैं। हम कभी यह समझ नहीं पाते कि उनसे मुक्ति होने में हमारी मुक्ति है। सबसे खोखली बात यह है कि वे ऐसी राजनीतिक विचारधाराओं के तले पनपते हैं जो समाजवादी होने का दावा करती है और इस व्यवस्था में सारे ठेके खास ठेकेदारों को मिलते हैं। कार्टेल के इस दौर में कभी आम आदमी के लिए बेहतरी की आशा नहीं की जा सकती, यह तब और भी मुश्किल है जब आम आदमी खुद ही अपने दामन को इन बाहुबलियों के हाथों से नहीं छुड़ाना चाहता।                                  
                                   
                                               

Friday, February 15, 2013

spring is the season, that drops the reason, of lovers who truly love





मैं जूली का गाना माई हार्ट इज बीटिंग सुन रहा हूँ, ऐसे तो मैं हमेशा इसे सुनता हूँ लेकिन वसंत के आगमन के मौके पर इसे सुनने में मुझे खास आनंद आता है। इसकी अंतिम लाइनें खास तौर पर वसंत को और अधिक ग्लोरीफाई करती है।  
spring is the season, that drops the reason, of lovers who truly love
                                                         इस खूबसूरत गीत की रचना हरिन्द्रनाथ चट्टोपाध्याय ने की थी जिन्होंने बावर्ची फिल्म में दद्दु की भूमिका निभाई थी। अरसे पहले हिंदी फिल्म के लिए लिखा यह इंग्लिश का गीत इतना लोकप्रिय हुआ, इससे काफी आश्चर्य होता है। शायद इसमें प्रेम और वसंत का कॉकटेल था जिसने इस गीत को लोकप्रिय किया। जब यह गाना चित्रहार में आता था तो पापा बताते थे कि इसमें जो छोटी लड़की है वो श्रीदेवी है और बड़ी लक्ष्मी।
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मुझे गोलमाल का गीत आने वाला पल जाने वाला है भी याद आता है। इस गाने का वो अंतरा मुझे बहुत भाता है। एक बार वक्त से लम्हा गिरा कोई, वहाँ दास्तां मिली लम्हा कहीं नहीं, वसंत में प्रेमिका अपने प्रेमी को प्राप्त करने की कामना से अशोक वृक्ष पर आघात करती है। फूल गिरते हैं और उसकी कामना पूरी होती है। अजीब सा संयोग है कि पश्चिम में वेलेंटाइन को वसंत में ही सजा मिली और राजा भोज भी इसी दिन वसंतोत्सव का आयोजन करते थे।
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वसंत के आने से निराला भी बहुत याद आते हैं उनकी कविता, यद्यपि ईर्ष्या नहीं मुझे, लेकिन मैं ही वसंत का अग्रदूत, ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत। उनका वसंत हमें ग्लोरीफाई करता है। अपनी पहचान दिलाता है। इसके बाद कितने कवियों में वसंत पर कविताएँ लिखी होंगी लेकिन वसंत के ब्रांड एम्बेसडर निराला ही रहे।
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वसंत पर माँ सरस्वती भी याद आती हैं। वो कितनी सोबर हैं। मुझे याद आता है जब पहली बार ज्ञात स्मृतियों में मैं बाल कटाने गया, तो वहाँ दुकान में सरस्वती जी का एक पोस्टर लगा था। वो वीणा बजा रही थीं, उनके बगल से एक नदी गुजर रही थी। एक मोर पास ही खड़ा था। मुझे लगा कि ये जरूर स्वर्ग का दृश्य होगा। वसंत का यह मेरे जीवन में पहला रंग था, कविता और संगीत से भरा। अरसे बाद पता चला कि ये चित्र राजा रवि वर्मा ने बनाया है। देवी सरस्वती के प्रति जो मन में श्रद्धा के भाव हैं उसमें बहुत बड़ा योगदान राजा रवि वर्मा का है जिन्होंने इस स्वर्गिक दृश्य को साकार किया। मुझे याद आता है कि स्कूल में वासंती परिधान पहने लड़कियां जब देवी सरस्वती की आराधना करती थीं तब लगता था कि दुनिया में कहीं न कहीं पढ़ने वालों के लिए भी स्पेस है भले ही वो बहुत सीमित हो।
                                            

Wednesday, February 6, 2013

मेरी कालोनी के हनुमान



उस घटना को चार सौ साल गुजर गए जब हनुमान जी अंतिम बार इस धरती पर अपने अवतारी रूप में प्रकट हुए। फिर तुलसी जैसा भक्त नहीं आया, उन्हें लीला धरने की जरूरत नहीं हुई। फिर हनुमान किसी को नहीं दिखे, वो इलाहाबाद में लेट गए गंगा के किनारे। यह कथा बार-बार याद आती है और सोचकर अच्छा लगता है कि भविष्य में कभी तुलसी जैसे भक्त दोबारा आए तब हनुमान जी भी उन्हें दर्शन लाभ देने अवतार ले लेंगे।
    फिर भी मुझे कभी हनुमान जी के उस रूप में दर्शन करने की इच्छा नहीं हुई। मेरे कॉलोनी के संकट मोचक हनुमान जी इसकी बड़ी वजह हैं। जब भी उनके दर्शन को जाता हूँ और उनकी द्रवित मूर्ति को देखता हूँ तो जैसे सारे क्लेश क्षरित हो जाते हैं तब पाप का भाव मन से नष्ट हो जाता है। ऐसा लगता है कि चार सौ साल बाद भी वो गए नहीं, भक्तों के प्यार से मजबूर यहीं रह गए।
                              पहले नियम था हम तीन दोस्तों का, मंगलवार को जाते थे, एक खास समय में मिलते थे। प्रसाद का नारियल खाकर लंबी चर्चा शुरू करते थे। अब मैंने वो नियम तोड़ दिया। अब अरसे बाद जाता हूँ तब जाता हूँ जब बड़ी खुशी मिलती है तब जाता हूँ जब जन्मदिन होता है। कई महीनों से ऐसा नहीं हुआ कि मन में भाव आया कि दर्शन कर लूँ। बहुत देर से जाने के बाद उनके चेहरे पर शिकायत का भाव दिखता है लेकिन वे ऐसे देवता हैं जिनसे डर नहीं लगता। गणेश जी की तरह ही हनुमान जी बेहद सरल भगवान हैं।
                      पहले उनके सामने मैं मन्नतों की लंबी किश्त रख देता था, अब डिप्लोमैट हो गया हूँ। कह देता हूँ भगवान सुख-शांति दो, मन का अहंकार भी पुष्ट हो जाता है कि मैं अब माँगता नहीं और माँग भी रख देता हूँ।
                                               अजीब सी बात है कि मुझे हनुमान क्यों अच्छे लगते हैं क्योंकि मैं कभी शक्ति के पीछे नहीं पड़ा। हनुमान की बलिष्ठ भुजाओं और पहाड़ उठा लेने, समुद्र को पार करने की अदा की वजह से उनका भक्त नहीं बना। हो सकता था कि एक ताकतवर भगवान मुझे डरा देते और देवी पूजा की तरह ही पूजा में थोड़ा सा भी खलल होने से मैं घबरा जाता लेकिन हनुमान जी शक्ति के शिखर पर खड़े हो जाने के बावजूद भी विनम्र हैं उन्होंने अपने लिए सबसे निचली सीट ली है।
       ग्रुप फोटो खिंचाने के वक्त अपने महत्व का एहसास कराते हुए हम सबसे महत्वपूर्ण आदमी के बगल की सीटों में बैठते हैं। जमीन में बैठे लोग सबसे निचली श्रेणी के होते हैं लेकिन हनुमान जी ने हमेशा वही मुद्रा अपनाई और वो भी सेवा की मुद्रा।
                            समर्पण का ऐसा भाव किसी देवता में नहीं दिखता। शक्ति के शिखर पर होने के बावजूद वैराग्य की ऐसी भावना किसी देवता में नहीं।
              आज जब मैं मंदिर के करीब से गुजरा और युवाओं को मंदिर पर मत्था टेककर बाहर तिलक लगाकर आते हुए देखा तो आश्वस्त हुआ कि हमारे संकटमोचन अभी यहीं है। उनका आशीर्वाद हमेशा सुलभ है और रहेगा।

Friday, February 1, 2013

जब साड़ी पहनने वाली महिलाएँ दिखनी बंद हो जाएंगी



 सुबह की गुनगुनी धूप में जब मैं स्कूल जाता था पीछे बस्ता लटकाये तब न जाने कितनी बातें सोचता रहता था। मैं सड़क के दोनों किनारे सर्पिल गति से चलता था जो अक्सर साइकिल सवारों के लिए परेशानी का सबब हो जाया करता था। उस दौर में भी मेरे जेहन में था कि जो मैं यह सब देखता हूँ वो हमेशा रहने वाला नहीं। वो पूरी तरह साड़ियों का दौर था, सलवार में शायद ही किसी महिला को हम देखते थे लेकिन उस समय भी लगता था कि मेरे साथ की जो लड़कियाँ हैं जो अभी फ्राक पहनती हैं क्या बड़ी होकर साड़ी पहनेंगी, यह बहुत अजीब लगता और मुझे लगता कि तब तक समय बदल जाएगा और साड़ी परिदृश्य से गायब हो जाएगी।
                                      एक दस साल के लड़के के लिए यह सोचना सचमुच में अजीब होगा कि उसके साथ की लड़कियाँ वैसे ही परिधान पहनेंगी जैसा उसकी माँ और अन्य रिश्तेदार महिलाएँ अथवा पड़ोस की महिलाएँ पहनती हैं। इतना लंबा अंतराल गुजरने के बाद अब भी साड़ी में महिलाएँ दिखती हैं इससे मुझे गहरा सुकून मिलता है। मुझे लगता है कि मेरा बचपन अभी खत्म नहीं हुआ है, जब साड़ी पहनने वाली महिलाएँ पूरी तौर पर दिखनी बंद हो जाएंगी तब मुझसे जुड़ा मेरे बचपन का समय भी पूरी तौर पर खत्म हो जाएगा। ऐसा मुझे लगता है।
                                        अजीब बात यह है कि जो पुरुषों को सुकून पहुँचाता है वो स्त्रियों के लिए कई बार विरोधी होता है। मैंने अपनी बुआ को एवं कई अन्य महिलाओं को कहते हुए सुना कि साड़ी की तुलना में सलवार बहुत बेटर ड्रेस है और इसके पीछे के उनके तर्क बड़े अजीब हैं जो सामंती लगते हैं और जिन्हें कहना मुझे अच्छा नहीं लगता।
                मुझे सेरेमनियल रूप से साड़ी पहनने की प्रथा भी बड़ी अजीब लगती है. त्योहार के दिनों में अथवा मंदिरों में महिलाएँ अक्सर साड़ी ही पहनती हैं। सीरियल्स में भी इन बदलावों को खास तौर पर रेखांकित किया जाता है। ये रिश्ता क्या कहलाता है में अक्षरा का कैरेक्टर देखिये, जब महिला वर्किंग वूमेन हुई तो उसने सलवार पहनना शुरू कर दिया। ऐसा संक्रमण क्यों?
                          साड़ी पर इतना स्ट्रेस क्यों? यह प्रश्न ड्रेस कोड से जुड़ा अथवा रुचि से जुड़ा नहीं है। असल में ये २००० साल की परंपरा है हमारी संस्कृति और इतिहास इससे जुड़ा है और हमारी पहचान भी। जापान ने मेइजी रेस्टोरेशन के बाद वेस्टर्न ड्रेसकोड अपना लिया, जापानी पहचान समाप्त हो गई। हमारी भी पहचान समाप्त हो जाएगी, यदि भारत की महिलाएँ साड़ी की जगह दूसरे परिधानों को अपनाने लगें। भारतीय महिलाएं सलवार भी पहनें, जींस भी पहनें और दूसरे वेस्टर्न परिधानों का प्रयोग भी करें लेकिन साड़ी न छोड़े। सेरेमनियल रूप से ही सहीं, उसे पहनें जरूर।
          दिल्ली और मुंबई देश के दो महानगर हैं मुझे मुंबई में बड़ा सुकून मिला, वहाँ दादर में एक मॉल में मुझे अत्याधुनिक वस्त्रों से सजी महिलाएँ भी मिलीं और कांजीवरम की साड़ी पहने सीढ़ी पर चढ़ने में हिचकती महिलाएँ भी मिलीं। इसके विपरीत दिल्ली में एक तरह की ही महिलाएँ, वहाँ भारत का रंग नहीं है केवल रेशमी राजधानी ही दिखती है।
            मेरी मम्मी अभी पंजाब गई थीं कुछ दिनों पहले, उन्होंने बताया अमृतसर की लड़कियाँ चोटी लगाती हैं और खूबसूरत साड़ियाँ पहनती हैं उन्होंने वहाँ की लड़कियों की काफी तारीफ की।
            जिंदगी की खूबसूरती जींस में भी खिलती है सलवार में भी लेकिन साड़ी में परंपरा की भी खूबसूरती खिलती है। इतिहास की किताबों में पढ़ी हुई वत्सभट्टि द्वारा मंदसौर शिलालेख में लिखी पंक्ति याद आती है।
तारुण्य कान्त्युपचितौअपि सुवर्ण हार,
तांबुल पुष्प विधिनां समंगलकृतौअपि
नीराजनः प्रियैमुपैति न तावद प्रियो
यावन्न पट्टमयवस्त्र युगानि धत्ते।
स्पर्श-न्तार-विभाग-चित्रेण-नेभ शुभगेन।
यसैस कलामिदं क्षितितलमलकृतं पट्ट वस्त्रेण।

            अर्थात किसी तरूण स्त्री ने भले ही सोने का हार पहन लिया हो, फूलों से सजी हो और ओठों को पान से सुशोभित किया हो, सभी तरह के मंगल लक्षणों से युक्त हो लेकिन जब तक वो रेशमी साड़ी का धारण नहीं करेगी तब तक उसका प्रेमी उसे पसंद नहीं करेगा। साड़ी का पहला विज्ञापन, बिना रैंप में किसी महिला को चलाए एक कवि ने सूर्य मंदिर में रेशम बुनकरों के लिए लिखा। उनकी कामना जब तक सूरज का प्रकाश हम पर रहे तब तक फलीभूत होती रहे, यही कामना है।