Thursday, June 7, 2012
बिना बोरियत अबूझमाड़ का एक क्षण
Friday, May 25, 2012
यम तुम ऐसे तो नहीं थे..
सहसा मुझे लगा कि यम तुम कितना बदल गए
तुम कितने दयालु थे सुहागिनों के लिए दे देते थे कितने आशीष...
अपनी बनाई हुई मर्यादाओं को भी देते थे छोड़...
सुहागिनों को सुहागवती होने का वर देते थे खुशी से...
फिर सहसा तुम्हे क्या हुआ...
कभी भी तोड़ देते हो नेह की डोर..
बिना बताए, बिलखने छोड़ देते हो सुहागिनों को
तुम्हें उनकी चूड़ियों की खनखनाहट अब बुरी लगने लगी है न
क्या तुम्हें अब गर्मियों में उनका अपने सत्यवान के लिए गिड़गिड़ाना बुरा लगने लगा है...
तुम इतना क्यों बदल गए यम
Monday, April 23, 2012
एलेक्स के लिए....
Monday, December 5, 2011
क्यों अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे जीना...
88 की उम्र में टि्वट करते थे देवानंद
फिक्र को धुंए में उड़ाते जुट जाते थे नई फिल्म की शूटिंग के लिए
82 की उम्र में डायलिसिस करा सीधे सेट पर पहुँचते थे शम्मी
भारत के अगले रॉकस्टार को तैयार करने का जुनून
दिखता था उनके अंदर
82 में ही आडवाणी निकालते हैं लंबी रथयात्रा
घंटों खड़े स्वीकार करते हैं अभिवादन जनता का
पीएम बनने का सपना युवा जो है
100 की उम्र में मैराथन दौड़ते हैं फौजा सिंह
बढ़ती उम्र से पैदा होने वाली निराशा को पीछे छोड़ते हुए
और 82 की उम्र में ही मेरे बड़े पिता जी
मंदिर में गिरने से पैर टूटने के बाद
फिर जाने लगे हैं मंदिर
78 की मेरी बुआ
कमर टूटने के बाद फिर खड़ी हो गई है
शहर छोड़कर वो जा रही है उसी गाँव में,
जहाँ उसकी कमर टूटी थी।
86 की मेरी बुआ
हड्डियाँ टूटने के इतने समाचार सुनकर
चिंतित होकर कहती हैं ये इतने अधीर क्यों हैं
शांति से बैठें तो जी लेंगे कुछ और दिन...
सबको जीना अच्छा लगता है
क्यों अच्छा नहीं लगेगा, ऐसे जीना..
Tuesday, November 15, 2011
डिबिया में बंद जिंदगी
Tuesday, November 1, 2011

रौशन होर्डिंग्स में सुंदरियों की मुस्कानरेखा देखते हुए,
जब मैं राजधानी की रेशमी सड़कों से गुजरता हूँ,
सिविल लाइन में बने भव्य बंगलों से गुजरते हुए,
उनके इंटीरियर की तुलना गोथिक शैली से करता हूँ,
अबाधित ब्राडबैंड स्पीड के बीच जब फेसबुक के फीचर की तुलना गूगल प्लस से करता हूँ,
टैक सेवी होने का दंभ भरता हूँ,
सिटी मॉल में आइनाक्स में बैठा हुआ स्विट्जरलैंड के नजारे देखता हूँ,
तब सोचता हूँ कि मैं कितने खुशकिस्मत समय में हूँ?
यद्यपि मेरी किस्मत में फूल नहीं, उनकी खुशबू जरूर है
जैकपॉट खुला होता तो हैरिटेज होटल और रिसार्ट्स की तफरीह भी हो पाती,
एक पाँव जमीं में और एक आसमान पर होता,
इतना खुशकिस्मत समय?
फिर भी कुछ लोग क्यों इस समय को कोस रहे हैं,
ऐसे समय को जन्नत है जो एचजी वैल्स की टाइम मशीन को जीता है,
क्या वो उन जंगलों की चिंता कर रहे हैं जहाँ के बाशिंदे अब एंटीक पीस बनने जा रहे हैं हमारी दुनिया के लिए नुमाइश की चीज...
क्या उन्होंने बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट में बने फार्मूला वन रेस ट्रैक की भव्यता को नहीं देखा?
क्या उन्होंने सर्किट में पॉप गायिका गागा को गाते हुए नहीं सुना?
सर्किट में सिद्धार्थ माल्या की बाँहों में झूलती दीपिका पादुकोण की अदाएँ उन्हें क्यों नहीं भातीं?
उन्हें आखिर कब समझ आएगा कि सिद्धार्थ के पिता विजय माल्या ने गाँधी की घड़ी खरीद ली है और अब समय भी उनका है?
इतने खुशकिस्मत समय में वो रुदालियों की तरह प्रलाप क्यों कर रहे हैं?
(बर्तोल्त ब्रेख्त की भयानक खबर की कविता से प्रेरित, अनुभव को शुक्रिया जिसने मुझे फिर से कविता लिखने की प्रेरणा दी)
Wednesday, September 21, 2011
सैन्योरिटा जिंदगी न मिलेगी दोबारा का सुंदर गाना

Quien eres tu? (Who are you?)
Donde has estado? (where have you been?)
He removido cielo y tierra y no te encontre
(I moved heaven and earth and not find you)
Y llegas hoy (but you arrive today)
Tan de repente (So suddenly)
Y das sentido a toda mi vida con tu querer
(and give meaning to my life with your love)

