Tuesday, November 1, 2011


क्या यह भयानक समय है?

रौशन होर्डिंग्स में सुंदरियों की मुस्कानरेखा देखते हुए,

जब मैं राजधानी की रेशमी सड़कों से गुजरता हूँ,

सिविल लाइन में बने भव्य बंगलों से गुजरते हुए,

उनके इंटीरियर की तुलना गोथिक शैली से करता हूँ,

अबाधित ब्राडबैंड स्पीड के बीच जब फेसबुक के फीचर की तुलना गूगल प्लस से करता हूँ,

टैक सेवी होने का दंभ भरता हूँ,

सिटी मॉल में आइनाक्स में बैठा हुआ स्विट्जरलैंड के नजारे देखता हूँ,

तब सोचता हूँ कि मैं कितने खुशकिस्मत समय में हूँ?

यद्यपि मेरी किस्मत में फूल नहीं, उनकी खुशबू जरूर है

जैकपॉट खुला होता तो हैरिटेज होटल और रिसार्ट्स की तफरीह भी हो पाती,

एक पाँव जमीं में और एक आसमान पर होता,

इतना खुशकिस्मत समय?

फिर भी कुछ लोग क्यों इस समय को कोस रहे हैं,

ऐसे समय को जन्नत है जो एचजी वैल्स की टाइम मशीन को जीता है,

क्या वो उन जंगलों की चिंता कर रहे हैं जहाँ के बाशिंदे अब एंटीक पीस बनने जा रहे हैं हमारी दुनिया के लिए नुमाइश की चीज...

क्या उन्होंने बुद्धा इंटरनेशनल सर्किट में बने फार्मूला वन रेस ट्रैक की भव्यता को नहीं देखा?

क्या उन्होंने सर्किट में पॉप गायिका गागा को गाते हुए नहीं सुना?

सर्किट में सिद्धार्थ माल्या की बाँहों में झूलती दीपिका पादुकोण की अदाएँ उन्हें क्यों नहीं भातीं?

उन्हें आखिर कब समझ आएगा कि सिद्धार्थ के पिता विजय माल्या ने गाँधी की घड़ी खरीद ली है और अब समय भी उनका है?

इतने खुशकिस्मत समय में वो रुदालियों की तरह प्रलाप क्यों कर रहे हैं?

(बर्तोल्त ब्रेख्त की भयानक खबर की कविता से प्रेरित, अनुभव को शुक्रिया जिसने मुझे फिर से कविता लिखने की प्रेरणा दी)

Wednesday, September 21, 2011

सैन्योरिटा जिंदगी न मिलेगी दोबारा का सुंदर गाना


Quien eres tu? (Who are you?)

Donde has estado? (where have you been?)

He removido cielo y tierra y no te encontre

(I moved heaven and earth and not find you)

Y llegas hoy (but you arrive today)

Tan de repente (So suddenly)

Y das sentido a toda mi vida con tu querer

(and give meaning to my life with your love)

Sunday, September 11, 2011

मेरी त्र्यंबकेश्वर यात्रा(भाग 1)



रायपुर से मुंबई की ओर ट्रेन रूट में की गई यात्रा में मेरे लिए अक्सर आकर्षण का केंद्र होता है डोंगरगढ़ के बाद शुरू होने वाले घने जंगल। मुझे भूगोल की जानकारी नहीं तो केवल अनुमान लगाता हूँ कि ये या तो मैकल पर्वत श्रेणी के होंगे या दंडकारण्य के महान पठार के हिस्से। दुर्भाग्य से उस दिन की रात चाँदनी नहीं थी, अब जंगलों में वैसे जुगनू भी नहीं जिनसे अंधेरी रातें भी गुलजार होती थीं। कुछ सालों पहले मैंने इसी जंगल में सैकड़ों जुगनुओं को देखा था। ऊपर आकाश में तारे दिख रहे थे और नीचे जुगनू। पाकीजा का एक गाना याद आता है जुगनू हैं या जमीन पर उतरे हुए हैं तारें। सुना है कि पहले अरबी लोग इन जुगनुओं को एक काँच के डिब्बे में रख देते थे, रात में डिब्बे में भरे हुए सैकड़ों जुगनू टार्च की तरह काम करते थे। शहरों में रहने वाले हम लोगों को प्रकृति की कितनी थोड़ी जानकारी होती है इसका मुझे तब पता चला, जब मैंने और मेरे दोस्त ने पहली बार दिन में जुगनू देखा। वो हरे रंग का था, हम लोगों ने कहा कि हमने एक नया कीड़ा खोजा है। इसका नाम रखा सोकव। बाद में पता चला जिसे हम लोगों ने सोकव समझा वो तो जुगनू था। चाँदनी रातों में इन जंगलों से गुजरना अद्भुत अनुभव होता है। चाँदनी का मद्धिम प्रकाश पेड़ों और झरनों में गिरता है और पूरे जंगल में एक अजीब सन्नाटा छाया रहता है। शायद जंगल में मौजूद होने से ज्यादा बेहतर ट्रेन के भीतर से इसे देखना है क्योंकि तेज ठंडी हवाओं का थपेड़ा हमें और आनंदित करता है। खिड़की वाली जगह का बचपन का लालच हर बार जाग जाता है। महाराष्ट्र के भीतर प्रवेश करने पर यदि हम सड़क मार्ग से जाएँ तो शायद धुलिया के आसपास से सहयाद्री की श्रृंखला शुरू हो जाती है और यह अद्भुत अनुभव होता है। एक दशक पहले सड़क यात्रा में कवर किये गए कुछ शहर याद आते हैं। एक कस्बे में हमारी गाड़ी रूकी थी। छोटा कस्बा था पहाड़ियों से घिरा। पहली बार आए थे लेकिन ऐसा लगा कि पहले भी इस कस्बे से परिचय रहा। खैर जब नासिक पहुँचे तो स्टेशन छोटा सा लगा लेकिन शहर में पहुँचते ही लगा कि यह बड़ा शहर है और व्यवस्थित भी। त्र्‌यंबकेश्वर यहाँ से संभवतः ४० किमी दूर है। प्राचीन ज्योतिर्लिंग के अलावा यहाँ गोदावरी का उद्गम भी है। बताते हैं कि त्रिम्बक की पहाड़ियों से गोदावरी निकलती है। त्र्‌यंबकेश्वर में एक धारा दिखी लेकिन इतनी गंदी धारा थी कि लगा ही नहीं एक महान नदी की शुरुआती यात्रा यहाँ से हो रही है। रास्ते भर पहाड़ की तलहटी ने हरी घास की चादर ओढ़ ली थी। पास ही त्रिम्बक की मेघाच्छादित पहाड़ी दिख रही थी। नासिक से त्र्‌यंबकेश्वर के बीच एक छोटा सा पहाड़ी गाँव पड़ता है अंजनेरी। नासिक में अपने जीजाजी के घर जब मैं रुका तो उन्होंने अंजनेरी पर आधारित मिथक कथा की जानकारी मुझे दी। उन्होंने मुझे बताया कि अंजनेरी में हनुमान जी का जन्म हुआ था। यहाँ तक पहुँचने का रास्ता काफी कठिन है वे भी अरसे से नासिक में रहने के बाद पहली बार पिछले साल ही अंजनेरी जा पाये थे। त्र्‌यंबकेश्वर में रुकते ही सबसे पहले हम लोग गजानन धर्मशाला में ठहरे। यह शेगाँव वाले गजानन महाराज की धर्मशाला है। इतने सस्ते किराये में सुंदर कक्ष वाली संस्थान की धर्मशाला अन्य धार्मिक संस्थाओं के लिए आदर्श है कि किस प्रकार चढ़ावे के धन का बेहतर उपयोग उन भक्तों के लिए किया जा सकता है जो भक्ति भावना तो रखते हैं लेकिन जो सुदामा की तरह दीन-हीन होते हैं और अपने प्रभु के दर्शन के लिए लंबी कष्टप्रद यात्रा तय करते हैं। धर्मशाला की एक और विशेषता मैंने देखी, यहाँ सभी आर्थिक वर्ग के लोग थे, असली समाजवाद ऐसी ही जगहों में दिखता है जहाँ सब एक से लगें, कोई छोटा-बड़ा नहीं। रूम की टैरेस से हमें वो पहाड़ी दिखती थी जहाँ से गोदावरी की बहुत सी धाराओं में से एक धारा निकली थी। 
  स्नान करने के उपरांत हम मंदिर गये, त्र्‌यंबकेश्वर बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल है। पौराणिक कहानी मैंने नहीं पढ़ी लेकिन यह जरूर पता चला कि इस मंदिर का निर्माण अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। मंदिर की भव्यता महाकाल मंदिर की यादें ताजा करा देती है। भीड़ बहुत थी और भीड़ में मेरा दम घुटता है शायद फोबिया अधिक है सच्चाई कम है। इसलिए थोड़ा असहज महसूस हुआ। फिर सुबह जाना था, भीड़ में हुई परेशानी ने मानसिक रूप से थकाया और भोजन की भी उचित व्यवस्था नहीं थी, इसके चलते परेशानी कुछ और बढ़ी। सुबह के समय शिव जी के अच्छे से दर्शन हुए, फिर हमने परिक्रमा की। इसके बाद साढ़े आठ बजे तक का इंतजार किया। मुझे आशंका थी कि इतनी देर कैसे बैठ पाऊँगा पूजा-वेदी में, लेकिन भगवान की कृपा थी और पूजा करने के दौरान बहुत अच्छा अनुभव हुआ। पंडित जी के घर के तीसरे माले में पूजा हुई। वहाँ घर से वही त्रिम्बक की पहाड़ियाँ दिख रही थीं। इन्हें देखकर लग रहा था कि रास्ता बड़ा लंबा और कठिन है लेकिन असंभव नहीं। नेहरू ने भी लिखा था न अक्सर हमें आलोकित पर्वत शिखरों को प्राप्त करने के लिए थमी अंधेरी घाटियों से गुजरना होता है। लंबे समय से अंधेरी घाटियों से गुजर रहे हैं लेकिन रुके भी तो नहीं है। हौसलों का दिया बूझता प्रतीत होता है लेकिन संकल्प शक्ति भी है मन में, जिससे ये लड़ाई छेड़े हुए हैं। खैर वैदिक रीति से की गई पूजा ने एक बार फिर परंपरा में वापस लौटा दिया। अक्सर ऐसी पूजा के समय मुझे निर्मल वर्मा द्वारा लिखा शब्द याद आता है जब कोई हिंदू अपने संबंधियों की अस्थियाँ हरिद्वार में गंगा में बहाता है तो उसे वैसा ही अनुभव होता होगा जैसा यूनानियों को कैथार्सिस की सम्पूर्ति पर होता होगा।
  इतिहास की पढ़ाई ने काफी कुछ दिया है लेकिन बहुत कुछ छीन भी लिया है जैसाकि जेम्स जॉयस ने लिखा है कि इतिहास वह दुःस्वप्न है जिससे मैं जागने की कोशिश करता हूँ। अक्सर इसके चलते अपनी मान्यताओं पर शक भी हो जाता है। शायद बीते हुए समय में ऐसा होता होगा कि हम अपनी मान्यताओं पर टिके रहते होंगे लेकिन अपनी बदहाली का कारण अपने उन पापों अथवा अज्ञात कारणों पर छोड़ देते होंगे जो हमें भी नहीं मालूम। फिर भी जैसे खंडित देवता की पूजा नहीं होती, वैसे ही अगर आपके व्यक्तित्व में कुछ खंडित अंश रह गया तो उसकी भरपाई नहीं हो पाती और ये जीवन भर सालने वाली बात रहती है। मैं बहुत विषयान्तर कर रहा हूँ लिखते हुए लेकिन ये अनुभव मेरी उस यात्रा से भी जुड़े हुए हैं जिसे यात्रा के दौरान मैंने लगातार महसूस किया।

Tuesday, September 6, 2011

राहुल गाँधी कितने गाँधी!




कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी अपने पूर्वजों की तरह खद्दर पहनना पसंद करते हैं। उनके सहयोगी मंत्री कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम आदि को भी इसी वेशभूषा में देखा जा सकता है। अग्निवेश जैसे इनके सहयोगी भी एक खास किस्म का चोला धारण किये रहते हैं। हालांकि यह भी इतना ही सच है कि इनकी आत्मा कहीं से भी खद्दर नहीं है। 
  दरअसल खादी केवल एक वेशभूषा नहीं अथवा वो केवल कांग्रेस की पहचान नहीं। खादी आत्मनिर्भरता का प्रतीक है। खादी स्वदेशी का प्रतीक है। आक्सफोर्ड और हावर्ड से शिक्षित यूपीए सरकार के कर्ताधर्ता यह नेता क्या सही मायने में खादी को धारण करने लायक हैं। कैंब्रिज में शिक्षा गांधी ने भी ली, वे उस जमाने में बैरिस्टर बने थे जब गिने-चुने लोग ही अपने बच्चों को विदेशों में भेज पाने की हिम्मत करते थे। गांधी ने अपनी आत्मकथा में अपने को सामान्य दर्जे का विद्यार्थी कहा था लेकिन क्या सचमुच ऐसा था, अगर ऐसा होता तो इतना आर्थिक बोझ सहकर उनका परिवार उन्हें कभी भी विदेश नहीं भेजता। गांधी विदेश तो गये लेकिन अंदर से स्वदेशी रहे। उनके सबसे करीबी सहयोगी नेहरू जीवन भर भारतीयता और अंग्रेजियत के द्वंद्व में फंसे रहे, भारतीय उनके बहुत करीब नहीं जा पाए लेकिन वे उनसे उतने दूर भी नहीं थे क्योंकि नेहरू बहुत गहरे से भारतीय समाज में उतरे थे। गांधी पूरी तरह से भारतीय हो गए, उनकी धोती, उनकी सादगी, उनकी गहरी आध्यात्मिकता सबमें असल भारतीय चरित्र देखने को मिलता था। शायद गांधी ऐसी शख्सियत रहे होंगे जिनके इतने बड़े नेता होने के बावजूद बेहिचक कोई बच्चा भी उनसे बिना डरे और बिल्कुल आत्मीयता के भाव से मिल सकता था। बच्चों के साथ मुस्कुराते हुए उनके चेहरे वाली तस्वीरें दिखाती हैं कि इस महापुरुष में बिल्कुल बच्चों वाला दिल धड़कता था। उनके उत्तराधिकारी नेहरू में भी ये गुण था, बच्चों के उनके प्रेम से ही उनका जन्मदिवस बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। इंदिरा के लिए लिखा नेहरू का साहित्य उनके बच्चों के प्रेम का जीवंत उदाहरण है। 
  आप यह प्रश्न पूछ सकते हैं कि जब हम अपनी बात राहुल गांधी से शुरू कर रहे हैं तो फिर महात्मा गांधी और जवाहरलाल के संदर्भ बार-बार क्यों दे रहे हैं। दरअसल राहुल गांधी अपने को इस महान परंपरा से संबद्ध करते हैं। अगर वो न भी करें तो जनता राहुल को उनका अक्स समझती है। सार्वजनिक जीवन में आपको हर पल जनता के लिए जिम्मेदार होना पड़ता है। आपको अपना पक्ष हर मुद्दे पर जनता के सामने रखना ही होता है लेकिन भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लगातार बोलने वाले राहुल अपनी सरकार के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सफाई देने आगे क्यों नहीं आते? क्यों उन्होंने अन्ना हजारे के लिए वैसी अतिशय उदारता दिखाई जितनी प्रच्चनमंत्री मनमोहन सिंह ने दिखाई जब उन्होंने कहा कि आई रेस्पेक्ट अन्ना, आई सेल्यूट अन्ना । शून्य काल में पूरे भाषण के दौरान राहुल दृढ़ दिखे लेकिन उनकी दृढ़ता में एक तरह का एरोगेंस झलका। जनता ने देखा कि राहुल केवल एक पक्षीय लग रहे थे, वे सत्ता पक्ष से हैं और उन्हें लंबे समय तक सत्ता का सुख भोगना है तो जनलोकपाल बिल पारित होने के अधिकारहीन सत्ता का क्या वैसा उपभोग वो कर पाएंगे। युवराज को इस बात की गहरी नाराजगी थी। वे यह तर्क रखने लगे कि संवैच्चनिक संस्था बनाना अधिक प्रभावी रहेगा। जब राहुल को यह उचित लग रहा था तो उन्होंने यह सलाह पहले ही सरकार को क्यों नहीं दी। 
  पूरे मामले में सबसे बुरा पक्ष यह रहा कि कांग्रेस का बुजुर्ग और अनुभवी चेहरा पूरी तरह से हाशिये पर दिखा। मनमोहन द्वारा जनलोकपाल बिल पर आश्वासन देने के बाद अगले दिन राहुल का बयान निराश करने वाला था। उन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने पर तो बल दिया लेकिन उसके बेहतर तरीकों से सहमत नहीं दिखे। उनके पास अपना कोई मॉडल भी नहीं था, वे केवल एक आशंका लेकर आये थे कि इससे संसदीय प्रजातंत्र और इसकी निर्णयन प्रक्रिया कमजोर होगी। आप जनलोकपाल से असहमत हो सकते हैं लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही बड़ी लड़ाई से भावनात्मक रूप से अभिभूत तो दिख ही सकते हैं। यही निराशा का बिन्दु है, सत्ता तंत्र का संचालन इन्हीं हाथों से होना है और अन्ना के आंदोलन को संभालने के तरीकों में दिखी नाकामी और गंभीर गलतियाँ इस सत्ता तंत्र के थिंक टैंक के खोखलेपन को दर्शाती हैं। एक सामान्य आदमी भी यह समझ सकता था कि ऐसे भावनात्मक आंदोलनों को सख्ती से दबाया नहीं जा सकता, इसके लिए डिप्लोमैटिक तरीके अख्तियार करने होते हैं। आपको लचीला रूख रखना होता है और आपको ऐसे प्रवक्ता रखने चाहिए जो सरकार का पक्ष जनता तक सही ढंग से रख सकें। कपिल सिब्बल बड़े वकील हैं लेकिन वे मीडिया में ऐसे नजर आये जैसे अन्ना हजारे एक क्रिमिनल हों और सरकारी अभियोजक के रूप में वे उन पर बड़ा मुकदमा दर्ज कराना चाह रहे हों। दिग्विजय सिंह के लगातार बयानों से हुई फजीहत से भी सरकार ने सबक नहीं लिया और उनसे भी खुला मुँह रखने वाले मनीष तिवारी को अन्ना पर हमले के लिए आगे कर दिया। 
  अंततः जब संकेत मिलने लगे थे कि सरकार सरेंडर के मूड में है उस समय भी राहुल गांधी संसद में संजीदगी से जनलोकपाल से सैद्धांतिक सहमति जताते हुए भ्रष्टाचार से लड़ने के अपने तरीकों को रख सकते थे लेकिन राहुल वहां भी भटक गए। राहुल का एकमात्र सही फैसला संदीप दीक्षित को आगे करने का रहा। संदीप अपनी बातें संसद में प्रभावी ढंग से नहीं रख पाये लेकिन उनकी बातों में एक सचाई नजर आई और उन्होंने पार्टी पर लगी कालिख को कम करने में अपना सहयोग जरूर दिया। एक बात और रामबहादुर राय ने इस संबंध में एक अच्छा लेख लिखा, उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने उन्हें जनउफान के संबंध में वस्तुस्थिति से अंधेरे में रखा लेकिन नौकरशाहों ने उन्हें अच्छा फीडबैक दिया। जब प्रधानमंत्री को भी वस्तुस्थिति की जानकारी न हो पाये तो ये दुख होता है कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे हुए लोग जनता के दुखों से कितने अनभिज्ञ हैं। वे २० साल बाद देश को महाशक्ति बनाना चाहते हैं लेकिन डबल डिजिट ग्रोथ पाने के लिए आज जो पीढ़ी पीस रही है उसके दुखों का हाल क्या इस सरकार को है? अब वक्त आ गया है कि शरद यादव और लालू यादव जैसे विदूषकों से हमें मुक्ति मिले, मनीष तिवारी जैसे अहंकारी लोग जो सफेद खद्दर पहनते हैं लेकिन गांधी की विनम्रता उन्हें छू भी नहीं गई हैं गांधीगिरी का सहारा लें और ऐसे लोगों को सत्ता से पदच्युत करें।

Thursday, August 25, 2011

मैडम अरुंधति की नीयत गलत, सवाल सहीं



अन्ना हजारे पर दिये गए अरुंधति राय का पूरा बयान पढ़ने के लिए टाइम्स आफ इंडिया की इस संबंध में खबर पर नजर डाली। खबर के साथ दिलचस्प बात यह थी कि पहली बार खबर के भीतर ही खबर पर आई टिप्पणियों की चर्चा भी थी। खबर में लिखा था कि इस बयान पर हमें कई रोचक टिप्पणियाँ प्राप्त हुई हैं। इनमें से एक टिप्पणी का जिक्र भी किया गया था। मैंने उत्सुकतावश टिप्पणियाँ देखी, ३९२ टिप्पणियाँ थीं, इनमें से अधिकाँश पढ़ने के बाद मैंने खुद टिप्पणी करनी चाही लेकिन कमेंट बाक्स ओपन नहीं हुआ, शायद इसके लिए प्रतिक्रिया समय समाप्त हो गया था। सामान्यतः ऐसे बयानों पर मिश्रित प्रतिक्रिया आती है। भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन चल रहा हो तो मामला कुछ ज्यादा संवेदनशील होता है तो अधिकतर बयान भावनाओं से प्रभावित होते हैं। ऐसे में अरुंधति राय ने नकारात्मक टिप्पणी की तो जाहिर है कि लोग अपने कमेंट में इसका विरोध करेंगे लेकिन इस मामले में एक भी व्यक्ति ने अरुंधति राय का साथ नहीं दिया।
  तो हम क्या सोचें। अखबार ने अरुंधति राय के हवाले से हेडिंग लगाई थी अन्ना सेकुलर नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि जब अन्ना ने मामला भ्रष्टाचार का उठाया है तो यहाँ धर्मनिरपेक्षतावाद की बात कहाँ से आती है। अगर अरुंधति अण्णा से असहमत हैं तो उनके द्वारा प्रस्तावित लोकपाल बिल पर बात करें। जनता के संबंध में इस किस्म की अच्छी डिबेट होनी चाहिये। सरकार के नुमाइंदों को, सिविल सोसायटी के नुमाइंदे को और दीगर पक्षों को रामलीला मैदान के मंच से इस डिबेट को बढ़ाना चाहिए। जाहिर है जनता के सामने दूध का दूध और पानी का पानी होगा। अरुंधति ने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठाये हैं। मसलन लोकपाल में जो सदस्य होंगे, उनमें से अधिकाँश उसी न्यायपालिका और कार्यपालिका से आयेंगे जिसमें हो रहे भ्रष्टाचार के लिए देश लोकपाल की माँग कर रहा है। सिविल सोसायटी के लोगों को भी शामिल करने की बात की जा रही है। विरोधियों को तर्क है कि इंडिया अंगेस्ट करप्शन के सदस्यों को ही इससे लाभ मिलेगा। अरुंधति ने यह बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है। अगर लोकपाल के लिए सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया गलत हुई तो देश को भ्रष्टाचार का दोहरा बोझ उठाना पड़ेगा। मौजूदा तंत्र के भ्रष्टाचार का और लोकपाल के भ्रष्टाचार का। 
  साफ है कि बहस हुई तो चीजें ज्यादा स्पष्ट होंगी और इनका समाधान भी सामने आयेगा लेकिन यहाँ बहस की बात नहीं हो रही है। यहाँ आपस में कीचड़ उछालने का दौर चल रहा है। बड़ा सवाल नीयत का भी है। अरुंधति राय की बात भले ही सही हो लेकिन इसके कहने के पीछे उनकी नीयत बिल्कुल ही गलत है। यह बेहद व्यक्तिगत किस्म का हमला अन्ना के चरित्र पर है। बोल कि लब आजाद हैं तेरे वाले इस देश में अरुंधति का अन्ना पर कुछ टिप्पणी करना गलत नहीं है। उन्होंने बिल्कुल सही कहा कि अन्ना को राज ठाकरे को दिये आशीर्वाद और मोदी की थपथपाई पीठ पर भी जनता को अपनी सफाई देनी चाहिये लेकिन अरुंधति यह कैसे भूल गईं कि अन्ना ने इसके ठीक बाद नीतीश कुमार की तारीफ भी की थी लेकिन जब आप व्यक्तिगत आरोप लगा रहे हों तो ऐसी बातों को प्रकट नहीं करते क्योंकि इससे आपके तर्क भोथरे साबित होने लगते हैं। 
  भारत की जनता स्वस्थ बहस का हमेशा स्वागत करती है उदाहरण के लिए अरुणा राय का मामला लें, उन्होंने जनलोकपाल बिल पर अपनी आपत्ति रखी, जनता ने उनके प्रति विरोध प्रकट नहीं किया। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के कार्यकर्ता तो चाह रहे हैं कि ऐसी बहस हो लेकिन सरकार इसके लिए तैयार नहीं है। जब सिविल सोसायटी और सरकार के नुमाइंदों के बीच बहस हुई तो भी सिविल सोसायटी ने बहस को जनता के बीच चलाने कहा लेकिन सरकार तैयार नहीं हुई। सरकार कहती है कि उसका बिल मजबूत है। अगर सरकार ने बिल मजबूत बनाया है तो जनता इसे क्यों पसंद नहीं कर रही है। अगर यह संविधान और देश की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए लिया गया निर्णय है तो सरकार के नुमाइंदों को खुलकर जनता को इसके प्रावधानों के संबंध में और जनलोकपाल की खामियों के संबंध में जनता को बताना चाहिये। 
  अभी हाल ही में हिंदुस्तान टाइम्स में एक चर्चित कॉलमनिस्ट का लेख पढ़ा, इसमें उन्होंने कहा कि अन्न के आंदोलन का समर्थन मध्यवर्ग कर रहा है जो खाया-अघाया है। अगर मध्यवर्ग खाया-अघाया है तो उसे तफरीह करने मैकडोनल्ड के रेस्तरां में जाना चाहिये, आपने दिल्ली में तफरीह करने के लिए बहुत से शापिंग मॉल बनवाये हैं तो फिर वो रामलीला मैदान में भरी बारिश, कीचड़ और भीड़-भड़क्के के बीच क्या कर रहा है क्या वो महज फोटो खिंचवाने के लिए वहाँ यहाँ गया है अथवा उसे यहाँ मेले-ठेले जैसा आनंद आ रहा है?
  अरुंधति जैसी मार्क्सवादी लेखिका कभी इस बात को समझ नहीं पायेंगी कि मध्यवर्ग के लिए मान-सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी की गाढ़ी मेहनत की कमाई। जब मध्यवर्गीय व्यक्ति सरकारी दफ्तरों में अपना काम कराने जाता है तो उसे अधिकारी तो दूर क्लर्क के सामने भी लगभग गिड़गिड़ाना पड़ता है, हाथ गर्म करने के बाद भी उसके हिस्से में क्लर्क की मुस्कान नहीं आती, बड़ी दुत्कार के साथ उसका काम किया जाता है जैसे उसके ऊपर बड़ी अनुकंपा की गई हो, रूडयार्ड किपलिंग के शब्दों की तरह, व्हाइट मैन बर्डन। चेहरे बदल गए हैं और मैकाले का ब्राऊन मैन सर्वोच्च सत्ता में पहुँच गया है भ्रष्टाचार और शोषण के उसी तेवर के साथ, जिसकी कल्पना मैकाले ने ब्राऊन मैन के लिए की थी।


Friday, July 15, 2011

गंगा सी मेरी माँ




सिर पर हो उबलता सूरज

पाँव के नीचे जलती सड़क हो

पैदल दूर तलक जाना हो

प्यास से सूख रहा हलक हो

मन करता है शिशु सा बनकर माँ की गोद समाऊँ

उसके प्यार की ठंडक से

गर्मी से लड़ जाऊँ

                                                          माँ का स्मरण आते ही मुझे याद आने लगती है पतित पावनी गंगा जो हिमालय का स्वच्छ धवल आवरण छोड़कर मटमैले मैदानी इलाकों में बेसुध दौड़ती है ताकि उसके बच्चों को निर्मलता मिले, अन्न-वस्त्र जुटाने का सामर्थ्य प्राप्त हो, अपने बच्चों की गंदगी साफ करते स्वयं के गंदे होने का भय भी उसे नहीं होता। मुक्ति देने वाली माँ मुक्ति भी नहीं चाहती। उसकी करुणा, त्याग, तपस्या से प्रसन्न हो परमात्मा उसे सागर की गोद सुलाते हैं वहाँ भी उसे चैन नहीं मिलता, वह सूरज की उपासना करती है और मेघों के माध्यम से फिर नई ऊर्जा से धरती पर आ जाती है। ईश्वर को अवतार लेने में समय लगता है पर माँ का अवतरण किसी पूजा, प्रार्थना, अर्चना, वंदन की प्रतीक्षा नहीं करता। कहते हैं मृत्यु के समय राम कहने से मुक्ति मिलती है पर मेरा मानना है मृत्यु के समय माँ का स्मरण मुक्ति भले ही न दे, पर ऐसा जीवन अवश्य देगा जो देवताओं के लिए दुर्लभ है! मुझे ईश्वर के वरदान से ज्यादा माँ का आशीष प्रिय है। 

  मेरी माँ स्कूल नहीं गई थी पर वह निरक्षर नहीं थी, क्योंकि अक्षर(ईश्वर) से उनका गहरा प्रेम था, वस्तुतः निरक्षर तो हम है, शब्दों की बाजीगरी करने वाले मदारी से ज्यादा नहीं हैं हम। वेदों, पुराणों, शास्त्रों एवं धर्मग्रंथों के अध्ययन से ईश्वर को पाना उतना सहज नहीं है, जितना सहज निःस्वार्थ सेवा, प्रेम व त्याग से है “ रामहिं केवल प्रेम पिआरा” भौतिक रूप से संपन्न बनाने वाली शिक्षा(वर्तमान) आँखों की भाषा नहीं समझती, मेरी माँ आँखों की भाषा समझती थीं। वे जानती थी कि ईश्वर की दी हुई संपन्नता अपने स्वार्थपूर्ति या अहंकार की पुष्टि के लिए नहीं है, अपने दरवाजे पर आए परिचित-अपरिचित साधु, असाधु सभी के प्रति वे ईश्वर का भाव रखती। चरम अभाव की स्थिति में भी वे आगंतुक को पानी जरूर पिला देती थीं, वे वृक्षारोपण का सरकारी कार्यक्रम नहीं जानती थीं, स्वयं प्रेरित होकर तालाब के किनारे वृक्ष लगवाती, स्वयं तालाब में स्नान के बाद उन वृक्षों को सींचती। प्रयाग, वाराणसी, वृंदावन से आने वाले साधुओं को वे ऐसे पूजती, मानो वे उसके आत्मीय हों। हम कहते, अम्मा साधु तुम्हें ठग ले गए, तो वे हँस कर कहतीं, कृष्ण से बड़ा ठगिया कोई नहीं है! वे साधु तो केवल द्रव्य, अन्न या वस्त्र ले जाते हैं, परंतु मेरे कृष्ण तो मेरा सर्वस्व ले गए हैं इसलिए मुझसे दूर-दूर रहते हैं, मुझे विश्वास है देहत्याग के बाद वह ठगिया उन्हें जरूर मिल गया होगा। इसी से वे हमें भुलाए बैठी हैं। मां कि याद करता हूँ, आँखों में क्या होता है जिससे मिलना होगा ही नहीं, उसके लिए क्यूँ रोता है।

(मेरे मामा अशोक तिवारी का मेरी काकी के लिए लिखा लेख)

Monday, June 27, 2011

क्या २५ प्रतिशत आरक्षण व्यवस्था सफल हो पाएगी?


शिक्षा के अधिकार के अंतर्गत सरकार ने निजी स्कूलों में कमजोर आर्थिक परिस्थिति वाले बच्चों के लिए २५ फीसदी आरक्षण रखा है। इसके क्रियान्वयन के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त किए हैं। अधिकारी किस सीमा तक बच्चों को निजी स्कूलों में एडमिशन दिलाने में सफल होते हैं यह तो वक्त ही बताएगा। अगर वे सफल भी हुए तो भी कई ऐसे ज्वलंत सवाल हैं जिनका उत्तर दे पाना तंत्र के लिए कठिन होगा। पहली बात तो यह कि अधिकतर निजी स्कूल अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देते हैं। अगर एडमिशन होना है तो केवल प्राथमिक स्तर पर ही संभव है। इसका मतलब यह कि बच्चे का एडमिशन केवल क्लास वन में संभव है। अगर यह मान भी लें कि हिंदी माध्यम के बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में स्विच करने की सुविधा दी जाती है तो भी इतने वर्षों तक अंग्रेजी के ए बी सी डी.. से अपरिचित बच्चे नये माध्यम में कैसे अपने को अभ्यस्त कर पाएँगे।
दरअसल दोष हमारी शिक्षा पद्धति में है, इसे एकरूपता नहीं दी गई है। मातृभाषा में शिक्षा देने वाले स्कूलों में केवल हिंदी चलती है जबकि अंग्रेजी माध्यम के स्कूल अंग्रेजी में ही पूरी शिक्षा देने पर जोर देते हैं। आमतौर पर अंग्रेजी का आतंक हर जगह है लेकिन निजी स्कूलों में तो इस पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाता है। महँगी फीस वसूलने वाले स्कूलों में तो बच्चों के लिए कक्षा में अंग्रेजी में बात करना अनिवार्य कर दिया जाता है। वहीं मामूली फीस वसूलने वाले स्कूल भी हिंग्लिश पर जोर देते हैं मतलब भले ही बच्चे इंग्लिश न बोल सकें लेकिन उनकी भाषा में अंग्रेजी के शब्द प्रवेश कर जाएँ। कमजोर परिस्थिति से आने वाले बच्चे को कितनी दिक्कत होगी, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है। इस बात की भी आशंका है कि सुनियोजित तरीके से इन बच्चों को निकालने के लिए प्रबंधन षड़यंत्र बुनना शुरू कर दें, बच्चों को इतना परेशान किया जाए कि उनके अभिभावक खुद ही उन्हें स्कूल से बाहर निकाल लें।
  हाल ही में एक खबर आई है कि केरल के किसी जिले के कलेक्टर ने अपनी बिटिया का एडमिशन सरकारी स्कूल में कराया। इस खबर में दिलचस्प यह भी है कि कलेक्टर ने प्रबंधन को खासतौर पर हिदायत दी कि उनकी बिटिया के साथ दूसरे बच्चों की तरह ही व्यवहार किया जाए। उन्हें इस बात की पूरी आशंका थी कि उनकी बिटिया के साथ वीआईपी ट्रीटमेंट किया जा सकता है। जब हम स्कूल में पढ़ते थे तब भी तो बताया जाता था कि फलाना सहपाठी थानेदार का लड़का है और फलाना सहपाठी के पिता पालिटिक्स में हैं। जाहिर है जब सत्तातंत्र के इतने करीबी लोगों के बच्चे आपके स्कूल में पढ़ाई करेंगे, तो वजन पाने के लिए शिक्षक भी इनके प्रति एक उदार नजरिया रखेंगे।
खैर, अब यह तकलीफ दूर हो गई क्योंकि बड़े अधिकारियों और साधन संपन्न लोगों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ते ही नहीं। यह समस्या अब दूसरे रूप में सामने आ सकती है जब कमजोर परिस्थिति के बच्चे इन महंगे स्कूलों में प्रवेश करेंगे। इन स्कूलों से पढ़कर निकलने वाले बच्चे अपनी जड़ों से कभी नहीं जुड़ पाएँगे। वे हमेशा हीनता का भाव अपने भीतर लेकर जीएँगे। संभवतः उन्हें अपने परिवार से ही वितृष्णा हो जाए। यह त्रिशंकु जैसी स्थिति होगी जिसे स्वर्ग से तो निकाल दिया गया लेकिन धरती में भी जगह नहीं दी गई।